छत्तीसगढ़ के विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की शुरुआत, कांटों के झूले पर विराजीं मां काछनदेवी

Edited By Himansh sharma, Updated: 11 Oct, 2026 01:40 PM

bastar dussehra 2026 begins with unique kachan devi ritual

बस्तर दशहरा पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि यहां की जीवंत आदिवासी संस्कृति और अटूट आस्था का सबसे बड़ा प्रतीक है

रायपुर, अपनी अनूठी, प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के लिए पूरी दुनिया में विशेष पहचान रखने वाले बस्तर के ऐतिहासिक महापर्व बस्तर दशहरा की विभिन्न पूजा विधान हर्षोल्लास और गहरी आस्था के साथ शुरू हो गई हैं। करीब सात सदियों पुरानी इस गौरवशाली परंपरा का शुभारंभ हर साल की तरह इस बार भी परम्परागत पूजा विधान ‘काछन गादी’ के साथ संपन्न हुआ। इसके तहत पनका समाज की नाबालिग कुंवारी कन्या पीहू ने ‘मां काछनदेवी’ का स्वरूप धारण किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अनुष्ठान के दौरान कन्या के शरीर में स्वयं मां काछनदेवी का वास होता है। जब देवी रूपी बालिका को बेल के नुकीले कांटों से तैयार किए गए झूले पर लिटाया गया, तो वहां मौजूद जनसमूह अपार श्रद्धा एवं उत्साह से भर उठा। कांटों के इस नाजुक और कठिन झूले पर विराजित होकर देवी ने बस्तर राजपरिवार, बस्तर अंचल की जनता और प्रशासन को आगामी कार्यक्रमों को निर्बाध व सकुशल संपन्न कराने तथा 75 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व के आयोजन की अनुमति प्रदान की।

अनुष्ठान के दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य एवं माटी पुजारी कमलचंद भंजदेव ने काछन देवी के समक्ष शीश झुकाकर उनका आशीर्वाद लिया और इसके पश्चात उन्होंने गोलबाजार पहुंचकर मिरगान समुदाय की इष्ट देवी मां रैला देवी की विधिवत पूजा-अर्चना कर उनका भी आशीर्वाद प्राप्त किया। जैसे ही यह ऐतिहासिक और पारंपरिक रस्म पूरी हुई। इस दौरान पूरा काछन गुड़ी और गोलबाजार इलाका पारंपरिक वाद्य-ध्वनियों मोहरी बाजा की गूंज से गुंजायमान हो उठा।

इस ऐतिहासिक और पावन क्षण के साक्षी बनने के लिए स्थानीय जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और देश-विदेश से पहुंचे हजारों सैलानियों तथा समूचे बस्तर अंचल के श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। कार्यक्रम में सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष श्री महेश कश्यप, बस्तर दशहरा समिति के उपाध्यक्ष  बलराम मांझी, महापौर  संजय पाण्डे सहित कमिश्नर बस्तर श्री डोमन सिंह, आईजी बस्तर रेंज बीएन मीणा, कलेक्टर  आकाश छिकारा तथा पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा सहित मांझी-चालकी, नाइक-पाइक और मेंबर-मेंबरिन, पुजारी, गायता और बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक विशेष रूप से उपस्थित रहे। 

बस्तर दशहरा पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि यहां की जीवंत आदिवासी संस्कृति और अटूट आस्था का सबसे बड़ा प्रतीक है, जो बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी को समर्पित एवं उनकी अगाध श्रद्धा को दर्शाता है। इस महापर्व में यहाँ के हर समुदाय की सहकार एवं सक्रिय सहभागिता जुड़ा हुआ है और इस भव्य शुरुआत के साथ ही अब विश्व प्रसिद्ध महापर्व के विविध अनुष्ठानों का सिलसिला अनवरत जारी रहेगा।

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