Edited By Himansh sharma, Updated: 02 Oct, 2026 12:51 PM

मध्य प्रदेश के दतिया जिले में जमीन के भीतर से निकली चार पुरानी चांदी की मुद्राओं ने इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वालों का ध्यान खींचा है
दतिया। मध्य प्रदेश के दतिया जिले में जमीन के भीतर से निकली चार पुरानी चांदी की मुद्राओं ने इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वालों का ध्यान खींचा है। प्रारंभिक जांच में इन सिक्कों को मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल से जोड़ा गया है। खास बात यह है कि इन मुद्राओं पर अकबर के दौर में शुरू की गई इलाही संवत व्यवस्था से संबंधित तारीखों और महीनों के संकेत दिखाई देते हैं। जानकारी के मुताबिक, भरतगढ़ क्षेत्र में रहने वाले प्रीतम रजक के परिवार को अपनी जमीन पर निर्माण कार्य के दौरान ये चारों सिक्के मिले। जमीन की खुदाई के दौरान जब चांदी जैसी धातु के सिक्के सामने आए तो परिवार ने उन्हें सुरक्षित रख लिया। बाद में सिक्कों की ऐतिहासिक अहमियत समझने के लिए उन्हें स्थानीय स्तर पर दिखाया गया।
विधायक के जरिए प्रशासन तक पहुंची जानकारी
सिक्के मिलने के बाद परिवार उन्हें दतिया विधायक और शाही परिवार से जुड़े घनश्याम सिंह के पास लेकर पहुंचा। मामले की जानकारी मिलने पर उन्होंने कलेक्टर स्वप्निल वानखेड़े से संपर्क किया। कलेक्टर ने सिक्कों के साथ उन्हें पाने वाले व्यक्ति को प्रशासन के समक्ष प्रस्तुत करने को कहा, ताकि उनकी विधिवत जांच कराई जा सके। इसके बाद सिक्कों को विशेषज्ञों के सामने रखा गया। पुरातत्वविद और इतिहासकार वसीम खान ने चारों मुद्राओं का परीक्षण करते हुए उन पर मौजूद लेख, तारीखों, महीनों और टकसाल से जुड़े संकेतों का अध्ययन किया।
सिक्कों पर दिखी अकबर की नई व्यवस्था
इन मुद्राओं की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इन पर दिखाई देने वाली इलाही युग की तारीखें और महीनों के नाम बताए जा रहे हैं। अकबर के शासनकाल में प्रशासन और शाही व्यवस्था में कई प्रयोग किए गए थे। इन्हीं में से एक इलाही संवत भी था, जिसमें पारंपरिक हिजरी गणना के स्थान पर सौर वर्ष और अलग महीने की व्यवस्था को महत्व दिया गया। इतिहासकारों के अनुसार, इस दौर में विकसित की गई नई समय-गणना का प्रभाव शाही सिक्कों पर भी देखने को मिला। दतिया से मिले सिक्के इसी ऐतिहासिक प्रयोग की एक झलक पेश करते हैं।
'दीन-ए-इलाही' से अलग थी इलाही संवत की व्यवस्था
अकबर के शासनकाल से जुड़ी इलाही व्यवस्था को लेकर अक्सर दीन-ए-इलाही के साथ इसका उल्लेख किया जाता है, लेकिन दोनों को एक ही चीज मानना सही नहीं है। 16वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में अकबर ने अपनी धार्मिक और प्रशासनिक नीतियों में कई प्रयोग किए थे। इलाही कैलेंडर इन्हीं प्रयोगों से जुड़ी समय-गणना की व्यवस्था थी, जिसमें फारसी नामों वाले सौर महीनों का इस्तेमाल किया गया। सिक्कों पर इस व्यवस्था से जुड़े उल्लेख मिलना इन्हें ऐतिहासिक दृष्टि से खास बनाता है।
सिर्फ चांदी के सिक्के नहीं, बीते दौर का दस्तावेज
पुरातत्व विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, पुराने सिक्के किसी भी कालखंड को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं। इनके जरिए उस समय की मुद्रा व्यवस्था, धातु तकनीक, कलात्मक शैली, शासकीय प्रतीकों और आर्थिक गतिविधियों के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है।
दतिया में मिले इन सिक्कों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इनमें अकबर के दौर की उस व्यवस्था के संकेत दिखाई दे रहे हैं, जिसका इस्तेमाल लंबे समय तक नहीं चला। विशेषज्ञों की जांच और दस्तावेजीकरण से इन मुद्राओं के बारे में और तथ्य सामने आने की उम्मीद है।
अधिकारियों का यह भी कहना है कि ऐतिहासिक सिक्कों को डिजिटल रूप में संरक्षित किया जाए तो वे विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और इतिहास से जुड़े अध्ययन के लिए उपयोगी सामग्री बन सकते हैं। दतिया की जमीन से निकली ये चार चांदी की मुद्राएं अब स्थानीय खोज से आगे बढ़कर मुगलकालीन इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय की कड़ी के रूप
में देखी जा रही हैं।