प्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला! रिश्वत मामले में केवल रकम की बरामदगी किसी को दोषी नहीं ठहरा सकती, अधिकारी को किया बरी

Edited By Vandana Khosla, Updated: 21 Sep, 2026 03:11 PM

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रायपुरः छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने करीब एक दशक पुराने रिश्वत मामले में शिक्षा विभाग के एक अधिकारी को बरी करते हुए कहा है कि रिश्वत मांगने का ठोस सबूत न होने पर केवल रिश्वत की रकम बरामद होने से किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। न्यायमूर्ति नरेश कुमार...

रायपुरः छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने करीब एक दशक पुराने रिश्वत मामले में शिक्षा विभाग के एक अधिकारी को बरी करते हुए कहा है कि रिश्वत मांगने का ठोस सबूत न होने पर केवल रिश्वत की रकम बरामद होने से किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने सूरजपुर जिले में जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) के कार्यालय में तैनात लेखाकार मुरली प्रसाद चौधरी को कारावास की सजा सुनाने संबंधी अधीनस्थ अदालत के 2017 के आदेश को रद्द कर दिया।

बिलासपुर स्थित उच्च न्यायालय ने 18 सितंबर को यह आदेश पारित किया। चौधरी (41) ने सूरजपुर की विशेष अदालत के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के संबंधित प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया गया था। उच्च न्यायालय ने कहा कि रिश्वत मांगना अपराध का मुख्य आधार है और जब तक अभियोजन पक्ष ऐसी मांग को उचित संदेह से परे साबित नहीं करता, तब तक आरोपी के पास से रिश्वत की रकम बरामद होने मात्र से उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार कि मां सरस्वती शिक्षा समिति' के अध्यक्ष एवं प्रबंधक मोहित राम रजवाड़े ने समिति द्वारा चलाए जा रहे एक स्कूल की मान्यता के सिलसिले में 2014 में डीईओ कार्यालय से संपर्क किया था।

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि 20 जून 2014 को चौधरी ने रजवाड़े से 15 हजार रुपये की मांग की और उनसे तुरंत पांच हजार रुपये देने को कहा, जिसमें से कथित तौर पर 4,900 रुपये दिए गए थे। इसके बाद रजवाड़े 21 जून 2014 को बिलासपुर स्थित भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) गए और लिखित शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के सत्यापन के दौरान उन्हें चौधरी के साथ अपनी बातचीत रिकॉर्ड करने को कहा गया। शिकायत और कथित रिकॉर्डिंग के आधार पर एसीबी ने 30 जून 2014 को जाल बिछाया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, चौधरी ने शिकायतकर्ता से आठ हजार रुपये लिए, नोट गिने और उन्हें अपनी पैंट की बाईं जेब में रख लिया, जिसके बाद उन्हें पकड़ लिया गया। एसीबी ने चौधरी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया और बाद में विशेष अदालत ने उन्हें दोषी ठहराकर सजा सुनाई।

चौधरी के अधिवक्ता आशुतोष त्रिवेदी ने तर्क दिया कि अपराध साबित करने के लिए रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार किए जाने, दोनों का सबूत होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि रजवाड़े एवं एक अन्य गवाह कुंवर साय अपने बयान से मुकर गए थे और उन्होंने अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन नहीं किया। अपील का विरोध करते हुए उप महाधिवक्ता डी. आर. मिंज ने तर्क दिया कि रिश्वत की रकम चौधरी की पैंट की बाईं जेब से बरामद की गई थी और इस बरामदगी की पुष्टि स्वतंत्र गवाहों के साथ-साथ पुलिस गवाहों ने भी की थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने गौर किया कि शिकायतकर्ता ही रिश्वत मांगने एवं उसे स्वीकार किए जाने का मुख्य गवाह था और वह अपने बयान से पूरी तरह से मुकर गया था।

न्यायालय ने इस बात पर भी गौर किया कि शिकायतकर्ता ने कहा था कि पुलिस दस्तावेजों और पंचनामों पर उनके हस्ताक्षर एक विश्राम गृह में लिए गए थे और उनकी सामग्री उन्हें पढ़कर नहीं सुनाई गई थी। न्यायालय ने कहा कि किसी भी गवाह ने अपराध के सबसे महत्वपूर्ण तत्व यानी रिश्वत की मांग की पुष्टि नहीं की।

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