श्रवण कुमार की याद दिलाता बेटा.. 89 साल की मां को व्हीलचेयर पर करा रहा नर्मदा परिक्रमा

Edited By Himansh sharma, Updated: 18 Jan, 2026 01:37 PM

son pushes mother in wheelchair on narmada parikrama

पेशे से सिक्योरिटी गार्ड सुदामा के मन में चार साल पहले नर्मदा परिक्रमा करने की चाह जगी थी

मंडला/इंदौर। आज के दौर में जब बुज़ुर्ग माता-पिता अक्सर उपेक्षा के शिकार हो जाते हैं, ऐसे समय में इंदौर के भगीरथपुरा निवासी सुदामा योगीनाथ (62) ने इंसानियत, सेवा और संस्कारों की एक ऐसी मिसाल पेश की है, जो हर किसी की आंखें नम कर रही है। सुदामा अपनी 89 वर्षीय मां रामकली को व्हीलचेयर पर बिठाकर नर्मदा परिक्रमा करा रहे हैं।यह यात्रा सिर्फ एक धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि मां की इच्छा को पूरा करने का संकल्प है। सुदामा ने यह यात्रा अप्रैल 2024 में ओंकारेश्वर से शुरू की, जो अब डिंडोरी होते हुए मंडला की ओर बढ़ रही है।

मां की इच्छा बनी जीवन का लक्ष्य

पेशे से सिक्योरिटी गार्ड सुदामा के मन में चार साल पहले नर्मदा परिक्रमा करने की चाह जगी थी, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते वे यह सपना पूरा नहीं कर पाए। उन्होंने पहले अपने बच्चों के दायित्व निभाए—दो बेटों सूरज और हरिओम व बेटी किरण की शादी पहले ही हो चुकी थी। साल 2024 में उन्होंने अपनी सबसे छोटी बेटी मुस्कान का विवाह भी संपन्न कर दिया।

इसके बाद मां रामकली ने अपनी इच्छा जाहिर की

मैं नर्मदा मैया की परिक्रमा करना चाहती हूं। बढ़ती उम्र और शारीरिक कमजोरी के कारण वे चल नहीं सकती थीं, लेकिन बेटे सुदामा ने हार नहीं मानी।

व्हीलचेयर बनी आस्था की राह

सुदामा ने मां को व्हीलचेयर पर बैठाया और परिक्रमा का संकल्प लेकर निकल पड़े। मां-बेटे की यह यात्रा जहां भी पहुंचती है, वहां लोग भावुक हो उठते हैं। रविवार को मंडला बस स्टैंड के पास सुबह करीब 11 बजे यह दृश्य देखने लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी।

लोगों ने फल-फूल भेंट किए, कुछ ने आर्थिक सहयोग दिया, तो कई श्रद्धालुओं ने सुदामा के पैर छूकर आशीर्वाद लिया।

आज के युग का श्रवण कुमार’

स्थानीय निवासी रवि सिंह ने कहा — आज जब बच्चे माता-पिता को वृद्धाश्रम छोड़ देते हैं, उस दौर में सुदामा ने हमें श्रवण कुमार की याद दिला दी है। यह सिर्फ यात्रा नहीं, संस्कारों का संदेश है।

मां की दुआ: भगवान सबको ऐसा बेटा दे

रामकली भावुक होकर कहती हैं - 

मैं चल नहीं सकती थी, लेकिन मेरे बेटे ने मुझे मां नर्मदा की परिक्रमा करवा दी। मेरी बस यही दुआ है कि सभी बच्चे खुश रहें और भगवान हर मां को ऐसा बेटा दे।

संस्कारों की चलती मिसाल

यह नर्मदा परिक्रमा सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि मां-बेटे के अटूट प्रेम, त्याग और संस्कारों की जीवंत कहानी है...जो समाज को यह याद दिलाती है कि सच्ची भक्ति, सबसे पहले माता-पिता की सेवा में है।

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