Edited By Himansh sharma, Updated: 14 Oct, 2026 10:25 PM
केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन के इस्तीफे के ऐलान ने तमिलनाडु की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है।
भोपाल। केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन के इस्तीफे के ऐलान ने तमिलनाडु की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। केंद्र सरकार में सूचना एवं प्रसारण तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे मुरुगन अब सक्रिय रूप से तमिलनाडु की राजनीति में काम करना चाहते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मंत्री पद से मुक्त करने और राज्यसभा की सदस्यता छोड़ने की अनुमति मांगी है। उनके इस फैसले को 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
आखिर एल. मुरुगन ने क्यों लिया यह फैसला?
एल. मुरुगन ने अपने पत्र में स्पष्ट किया कि अब वह जमीनी स्तर पर लौटकर पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ काम करना चाहते हैं। उनका लक्ष्य तमिलनाडु के गांवों और शहरों तक बीजेपी की पहुंच बढ़ाना और आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारियों को मजबूत करना है।
मुरुगन के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया तमिलनाडु दौरे के दौरान जनता के बीच दिखाई दिया उत्साह और समर्थन उनके लिए महत्वपूर्ण संकेत रहा। इससे उन्हें विश्वास हुआ कि राज्य में पार्टी के प्रदर्शन को और बेहतर बनाने की संभावनाएं मौजूद हैं।
उन्होंने अपने संदेश में कहा कि वह 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले संगठन को मजबूत करने के लिए अपना पूरा समय और ऊर्जा लगाना चाहते हैं। उनके इस कदम से यह साफ संकेत मिलता है कि वह फिलहाल सरकारी जिम्मेदारियों के बजाय पार्टी के विस्तार और जनसंपर्क पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं।
'राष्ट्र प्रथम, पार्टी दूसरे और स्वयं सबसे अंत में'
एल. मुरुगन ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी को भेजा गया पत्र साझा करते हुए अपनी राजनीतिक विचारधारा भी सामने रखी। उन्होंने 'राष्ट्र प्रथम, पार्टी दूसरे और स्वयं सबसे अंत में' के सिद्धांत को अपनी लगभग तीन दशक की राजनीतिक यात्रा का आधार बताया।
उनका कहना है कि वह तमिलनाडु के अलग-अलग इलाकों में जाकर लोगों से सीधे संवाद करना चाहते हैं। इसके साथ ही, केंद्र सरकार की योजनाओं और प्रधानमंत्री के विकसित भारत के संकल्प को आम लोगों तक पहुंचाने की दिशा में काम करेंगे।
मुरुगन का मानना है कि पार्टी की मजबूती के लिए कार्यकर्ताओं के बीच रहना और स्थानीय स्तर पर लोगों की समस्याओं को समझना जरूरी है। ऐसे में उनकी आगे की भूमिका संगठनात्मक गतिविधियों और जनसंपर्क के इर्द-गिर्द रहने की संभावना है।
दिहाड़ी मजदूर परिवार से केंद्रीय मंत्रिपरिषद तक का सफर
एल. मुरुगन की राजनीतिक यात्रा उनके पारिवारिक संघर्षों के कारण भी चर्चा में रहती है। उन्होंने अपने पत्र में बताया कि वह दिहाड़ी मजदूरी करने वाले माता-पिता के बेटे हैं। उनके माता-पिता मवेशी चराने का काम भी करते थे और तमिलनाडु के कोनूर गांव में आज भी साधारण जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
मुरुगन ने अपनी उपलब्धियों का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और बीजेपी में जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने के अवसर मिलने को दिया। उन्होंने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में काम किया। इसके बाद वह दो बार राज्यसभा के सदस्य बने और केंद्रीय मंत्रिपरिषद में भी जगह मिली।
उन्होंने केंद्र सरकार में लगभग पांच वर्षों तक सेवा करने का अवसर देने और भरोसा जताने के लिए प्रधानमंत्री मोदी का आभार व्यक्त किया। साथ ही, उन्होंने संगठन के माध्यम से जनता की सेवा जारी रखने के लिए उनका आशीर्वाद भी मांगा।
तमिलनाडु में बीजेपी की रणनीति के लिए क्यों अहम है यह कदम?
तमिलनाडु में बीजेपी लंबे समय से अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में एल. मुरुगन का संगठनात्मक काम पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला पार्टी की आगामी चुनावी तैयारियों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मुरुगन का अनुभव, कार्यकर्ताओं के साथ उनका संपर्क और राज्य की राजनीति की समझ पार्टी के लिए उपयोगी हो सकती है। हालांकि, उनके इस्तीफे के अनुरोध और राज्यसभा की सदस्यता छोड़ने की प्रक्रिया पर अंतिम स्थिति संबंधित संवैधानिक और औपचारिक प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
कुल मिलाकर, एल. मुरुगन का यह कदम केवल मंत्री पद छोड़ने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे तमिलनाडु में पार्टी संगठन को मजबूत करने और 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक तैयारी तेज करने का लक्ष्य दिखाई देता है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि मुरुगन की नई भूमिका राज्य में बीजेपी की राजनीतिक स्थिति को कितना प्रभावित करती है।