विवादों में घिरे संजय पाठक का बड़ा ऐलान: 51% जनसमर्थन नहीं मिला तो इस्तीफा

Edited By meena, Updated: 06 Apr, 2026 01:17 PM

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कटनी से भाजपा विधायक संजय पाठक ने एक ऐसा राजनीतिक दांव चला है, जिसने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने खुलकर घोषणा की है कि वे अपने कार्यकाल के बीच ही जनता के बीच जाकर खुद का...

भोपाल : कटनी से भाजपा विधायक संजय पाठक ने एक ऐसा राजनीतिक दांव चला है, जिसने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने खुलकर घोषणा की है कि वे अपने कार्यकाल के बीच ही जनता के बीच जाकर खुद का मूल्यांकन कराएंगे। उनका कहना है कि यदि 51 प्रतिशत से कम लोगों ने उनके काम को समर्थन दिया, तो वे बिना किसी हिचक के विधायक पद से इस्तीफा दे देंगे। यह बयान न केवल आत्मविश्वास दर्शाता है, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही का एक अनोखा उदाहरण भी पेश करता है।

पहले भी लिया था जनता का फीडबैक

संजय पाठक ने बताया कि यह पहली बार नहीं है जब वे जनता के बीच इस तरह का मूल्यांकन कराने जा रहे हैं। 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले भी उन्होंने मतदाताओं के बीच जाकर राय ली थी। उस समय लगभग 1.40 लाख मतदाताओं में से 1.02 लाख लोगों ने उनके पक्ष में समर्थन जताया था। इसके बाद चुनाव में भी उन्हें भारी मतों से जीत मिली। अब दो साल से अधिक का कार्यकाल पूरा होने के बाद वे फिर उसी प्रक्रिया को दोहराना चाहते हैं, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि जनता अभी भी उनके साथ खड़ी है या नहीं।

अवैध खनन के आरोपों से घिरा राजनीतिक करियर

हालांकि यह पूरा ऐलान ऐसे समय में आया है जब संजय पाठक अवैध खनन के गंभीर आरोपों में घिरे हुए हैं। उनकी पारिवारिक फर्मों पर आरोप है कि उन्होंने निर्धारित सीमा से अधिक खनन किया। प्रशासन ने इस मामले में करीब 443 करोड़ रुपये का भारी जुर्माना भी लगाया है। यह मामला अदालत में विचाराधीन है, जिससे उनकी राजनीतिक छवि पर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में उनका यह जनसमर्थन वाला कदम कई लोगों को अपनी छवि सुधारने की कोशिश भी लग रहा है।

हाईकोर्ट विवाद और बढ़ती राजनीतिक चुनौती

मामला तब और तूल पकड़ गया जब सुनवाई कर रहे हाईकोर्ट के जज से संपर्क करने का आरोप सामने आया। इस घटना के बाद संबंधित जज ने खुद को मामले से अलग कर लिया और हाईकोर्ट ने संजय पाठक के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के निर्देश दिए। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक और कानूनी दोनों मोर्चों पर उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे में अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या उनका 51 प्रतिशत जनसमर्थन वाला दावा सच साबित होता है या यह राजनीतिक जोखिम उनके लिए भारी पड़ता है।

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