पति-पत्नी के बीच अप्राकृतिक संबंध अपराध नहीं: सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पति को दी राहत

Edited By Himansh sharma, Updated: 27 Mar, 2026 12:17 PM

high court relief no offence in marital unnatural relations

भिंड जिले की एक महिला ने वर्ष 2023 में अपने पति और ससुराल पक्ष के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।

ग्वालियर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने वैवाहिक संबंधों को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि पति-पत्नी के बीच बने “अप्राकृतिक संबंध” को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इसी आधार पर पति के खिलाफ दर्ज एफआईआर को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया है। हालांकि, दहेज, मारपीट और प्रताड़ना से जुड़े अन्य आरोपों पर केस की सुनवाई जारी रहेगी।

2023 में दर्ज हुआ था मामला

भिंड जिले की एक महिला ने वर्ष 2023 में अपने पति और ससुराल पक्ष के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। महिला का आरोप था कि उससे 10 लाख रुपये और बुलेट मोटरसाइकिल की मांग की जा रही थी। इसके अलावा उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। शिकायत में पति पर अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का आरोप भी लगाया गया था।

इन धाराओं में दर्ज हुआ था केस

महिला की शिकायत पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 377, 498ए और 354 के तहत मामला दर्ज किया था। पुलिस ने दहेज और प्रताड़ना से जुड़े मामलों में चार्जशीट भी पेश कर दी है।

हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने कहा कि पति-पत्नी के बीच सहमति से बने संबंधों को धारा 377 के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने 377 से संबंधित एफआईआर को आंशिक रूप से रद्द कर दिया।

अन्य आरोपों पर जारी रहेगी सुनवाई

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दहेज, मारपीट और प्रताड़ना जैसे गंभीर आरोपों को इस फैसले से राहत नहीं मिलेगी। इन मामलों में ट्रायल जारी रहेगा और कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई होगी।

दोनों पक्षों की दलीलें

सुनवाई के दौरान पति के वकील ने तर्क दिया कि मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है और महिला के बयान में विरोधाभास है। वहीं कोर्ट ने ससुराल पक्ष के खिलाफ लगे अन्य आरोपों को खारिज करने से इनकार कर दिया।

निष्कर्ष

हाईकोर्ट के इस फैसले से आरोपी पति को आंशिक राहत जरूर मिली है, लेकिन दहेज और प्रताड़ना के गंभीर आरोपों को लेकर कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। यह फैसला वैवाहिक संबंधों में धारा 377 के उपयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

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