75 दिनों तक चलता है बस्तर का दशहरा, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने देखीं सदियों पुरानी अनोखी परंपराएं

Edited By Himansh sharma, Updated: 23 Oct, 2026 04:56 PM

president murmu explores bastar s 75 day dussehra tradition

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, जनजातीय परंपराओं और सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित प्रदर्शनी का अवलोकन किया।

रायपुर, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, जनजातीय परंपराओं और सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित प्रदर्शनी का अवलोकन किया। बस्तर संभाग के मुख्यालय जगदलपुर के लालबाग मैदान में आयोजित प्रदर्शनी में बस्तर दशहरा की विभिन्न विधाओं, पारंपरिक पूजा-अनुष्ठानों, रथ निर्माण की विशिष्ट तकनीक, देवी-देवताओं की आराधना, जनजातीय समुदायों की भागीदारी और ऐतिहासिक परंपराओं को आकर्षक चित्रों एवं विस्तृत विवरणों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया।

बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि बस्तर की विभिन्न जनजातीय समाज की सामूहिक आस्था, सांस्कृतिक एकता, पारंपरिक ज्ञान और सामाजिक सहभागिता का अद्वितीय उदाहरण है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह महापर्व देश के अन्य स्थानों पर मनाए जाने वाले दशहरा उत्सवों से अलग अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यह दशहरा मुख्य रूप से आराध्य देवी मां दंतेश्वरी और क्षेत्रीय देवी-देवताओं की आराधना तथा लोक परंपराओं से जुड़ा हुआ है।
 
प्रदर्शनी में बस्तर दशहरा के प्रारंभ से समापन तक संपन्न होने वाले प्रमुख अनुष्ठानों को क्रमबद्ध रूप से दर्शाया गया। इसमें पाट जात्रा, डेरी गड़ाई, बारसी उतरानी, नार फोड़नी, रथ निर्माण, काछिन गादी, कलश स्थापना, जोगी बिठाई, फूल रथ परिक्रमा, बेल निवता, निशा जात्रा, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी, मुरिया दरबार तथा कुटुम्ब जात्रा जैसी विशिष्ट परंपराओं का समावेश किया गया।

प्रदर्शनी में बस्तर दशहरा  की प्रमुख विधाओं और अनुष्ठानों का विस्तृत प्रदर्शन* पाट जात्रा से होता है बस्तर दशहरा का शुभारंभ
 
प्रदर्शनी में बताया गया कि बस्तर दशहरा की शुरुआत श्रावण अमावस्या अर्थात हरियाली अमावस्या को पाट जात्रा से होती है। इस अवसर पर रथ निर्माण के लिए जंगल से लाई गई लकड़ी के विशाल तने, जिसे स्थानीय हल्बी भाषा में ठुरलु खोटला कहा जाता है, की विधिवत पूजा की जाती है। पूजा के दौरान पारंपरिक अर्पण एवं बलि की रस्म निभाई जाती है। इसके बाद रथ निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। इस अनुष्ठान का उद्देश्य देवी-देवताओं का आह्वान कर दशहरा पर्व के निर्विघ्न संपन्न होने की प्रार्थना करना है।

डेरी गड़ाई से प्रारंभ होती है रथ निर्माण की परंपरा
 
पाट जात्रा के बाद डेरी गड़ाई का अनुष्ठान किया जाता है। इसमें लगभग 10 फीट ऊंची साल वृक्ष की दो शाखायुक्त लकड़ियों को सिरहासार में स्थापित किया जाता है। इन पर हल्दी, कुमकुम और चंदन का लेप लगाकर सफेद वस्त्र बांधे जाते हैं। पूजा के दौरान पारंपरिक रूप से मंगरी मछली, अंडा और फूला-लाई अर्पित की जाती है। इस अनुष्ठान को स्तंभारोहण का स्वरूप माना जाता है। डेरी गड़ाई के बाद जंगल से रथ निर्माण की लकड़ियां और निर्धारित गांवों से कारीगर आने लगते हैं। इस रस्म में बिरिंगपाल के ग्रामीणों और समरथ परिवार की विशेष जिम्मेदारी होती है।

बारसी उतारनी

 रथ निर्माण से पहले बारसी उतारनी के अंतर्गत पारंपरिक औजारों की पूजा की जाती है। इसके बाद लकड़ी पर पहली बार बारसी अथवा बसुला चलाकर निर्माण कार्य शुरू किया जाता है। बेड़ा उमरगांव और झाड़-उमरगांव के लगभग 150 पारंपरिक कारीगर रथ निर्माण में भाग लेते हैं। ये कारीगर लगभग 15 से 20 दिनों में रथ तैयार करते हैं और अंतिम रथ परिक्रमा तक आयोजन से जुड़े रहते हैं। नार झड़नी रथ के लकड़ी के पहियों में धुरी लगाने के लिए गोलाकार छेद बनाने की विशिष्ट प्रक्रिया है। पहियों में लोहे की गोलाकार पट्टी गुड़दा लगाई जाती है, जिससे रथ को मजबूती मिलती है और उसका संचालन सुचारु होता है। यह परंपरा बस्तर के ग्रामीणों के पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित तकनीकी ज्ञान और शिल्पकला को प्रदर्शित करती है।

मगरमुंही
 
प्रदर्शनी में रथ निर्माण की तकनीकी विशेषताओं को भी दर्शाया गया। रथ के पहियों की धुरी के ऊपर रखी जाने वाली लगभग 40 फीट लंबी और डेढ़ फीट मोटी विशाल लकड़ियों को मगरमुंही कहा जाता है। ये रथ के मुख्य आधार और चेसिस का कार्य करती हैं। इनका आकार मगरमच्छ जैसा होने के कारण इन्हें मगरमुंही कहा जाता है।

रथ सिंघारनी
 
रथ सिंघारनी के अंतर्गत मोंगरापाल और चोलनार के ग्रामीण फूल रथ तथा विजय रथ को रंग-बिरंगे कपड़ों, फूलों, कागज की सजावटी सामग्री और अन्य पारंपरिक वस्तुओं से सजाते हैं। रथ के ऊपरी हिस्से को सियाड़ी के पत्तों से बने थरला से ढका जाता है। विजय रथ में चार घोड़ों और घुड़सवारों की आकृतियां भी लगाई जाती हैं।

रथ उसकानी

 रथ निर्माण पूर्ण होने के बाद उसे पहली बार अपने स्थान से आगे बढ़ाने की रस्म रथ उसकानी कहलाती है। इससे पहले पूजा-अर्चना और पारंपरिक अनुष्ठान कर रथ की सुरक्षित परिक्रमा की कामना की जाती है। बस्तर दशहरा में रथ खींचने के लिए आधुनिक रस्सियों के स्थान पर सियाड़ी बेल की छाल से पारंपरिक डोर तैयार की जाती है। ग्रामीण जंगलों से सियाड़ी की छाल एकत्र कर उसे सुखाने, कूटने, भिगोने और गूंथने की लंबी प्रक्रिया से मजबूत रस्सी बनाते हैं। इसे रथ की मगरमुंही से बांधा जाता है। इस रस्सी को मां दंतेश्वरी की आस्था और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु रथ खींचने से पहले इसे प्रणाम करते हैं। कई श्रद्धालु इसके छोटे टुकड़े को सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और परिवार की सुरक्षा की मान्यता के साथ अपने घरों में रखते हैं। सियाड़ी के पत्तों का उपयोग दोना-पत्तल और रथ की सजावट में भी होता है।

काछिन गादी में देवी से ली जाती है दशहरा आयोजन की अनुमति

बस्तर दशहरा की अत्यंत महत्वपूर्ण रस्म काछिन गादी है। आश्विन अमावस्या को जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछिन गुड़ी में पनका समाज की एक कुंवारी बालिका पर देवी के आरूढ़ होने की पारंपरिक मान्यता के साथ पूजा की जाती है। बालिका को कांटों से बने झूले पर बैठाकर रण की देवी काछिन से दशहरा आयोजन की अनुमति और आशीर्वाद मांगा जाता है। काछिन देवी को पशुधन और अन्न-धन की रक्षक तथा विभिन्न स्थानीय समुदायों की कुलदेवी माना जाता है। इस परंपरा का संबंध चालुक्य राजा दलपत देव के काल से बताया गया है। प्रदर्शनी में लगभग वर्ष 1772 के बाद काछिन गुड़ी के निर्माण और राजधानी के जगदलपुर स्थानांतरण से जुड़ी ऐतिहासिक मान्यताओं को भी दर्शाया गया।

आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को मां दंतेश्वरी मंदिर में कलश स्थापना के साथ नवरात्रि की पूजा शुरू होती है। इसके बाद मावली, कंकालिन, करनाकोटिन, शीतला सहित अन्य देवी-देवताओं के मंदिरों में कलश स्थापित किए जाते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों तक विभिन्न मंदिरों में मनोकामना ज्योति और अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है। मां दंतेश्वरी मंदिर में देश-विदेश के श्रद्धालु हजारों ज्योति कलश स्थापित करवाते हैं। इनकी देखरेख की पारंपरिक जिम्मेदारी यादव अर्थात रावत समाज के सेवादार निभाते हैं। यह व्यवस्था रियासतकाल से चली आ रही है।

जोगी बिठाई में नौ दिनों की कठोर साधना और उपवास
 
जोगी बिठाई बस्तर दशहरा की विशिष्ट आध्यात्मिक परंपरा है। इसमें बड़े आमाबाल के एक व्यक्ति को सिरहासार में नौ दिनों की योग-साधना और उपवास के लिए बैठाया जाता है। जोगी को मावली देवी के खांडा के साथ शोभायात्रा में सिरहासार लाया जाता है। वहां पूजा-अर्चना के बाद निर्धारित गड्ढे में बैठाया जाता है। पास में अन्न खूंटा और अखंड ज्योति स्थापित की जाती है। जोगी नौ दिनों तक कठिन साधना करता है। यह अनुष्ठान दशहरा पर्व के निर्विघ्न संपन्न होने के संकल्प का प्रतीक है। 

फूल रथ परिक्रमा में हजारों श्रद्धालुओं की सहभागिता
 
आश्विन शुक्ल द्वितीया से सप्तमी तक छह दिनों तक चार पहियों वाले फूल रथ की परिक्रमा होती है। फूलों से सजाए जाने के कारण इसे फूल रथ कहा जाता है। मां दंतेश्वरी के मुख्य पुजारी देवी का छत्र लेकर रथ पर सवार होते हैं और हजारों ग्रामीण पारंपरिक डोर से रथ खींचते हैं। प्रत्येक परिक्रमा से पहले पूजा, नारियल अर्पण, पारंपरिक बलि और पुलिस सलामी की रस्म निभाई जाती है। जगन्नाथ मंदिर के सामने केंवट समाज की महिलाएं रथ पर लाई-चना, पुष्प और पान बीड़ा अर्पित करती हैं। रथ की पूजा सामग्री उपलब्ध कराने में समरथ केंवट परिवार की पारंपरिक भूमिका होती है। परिक्रमा के बाद यादव और घाकड़ समाज की सुहागिन महिलाएं मां दंतेश्वरी की आरती करती हैं। आरती की शुरुआत दो महिलाओं से होती है और विजय रथ की परिक्रमा तक इनकी संख्या 12 हो जाती है। यह परंपरा बस्तर

दशहरा में महिलाओं की महत्वपूर्ण सहभागिता को रेखांकित करती है।
 
बेल नेवता की परंपरा में बेल वृक्ष को देवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। जुड़वा बेल फलों का देवाधिदेव शिव एवं जगत जननी मां पार्वती का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है। पांचवीं फूल रथ परिक्रमा के बाद सरगीपाल में बेल वृक्ष की पूजा कर उसकी शाखा पर लाल कपड़ा, नारियल और सुपारी बांधकर दशहरा में शामिल होने का निमंत्रण दिया जाता है।
आश्विन शुक्ल सप्तमी को बेल जात्रा के दौरान राजपरिवार, पुजारी और ग्रामीण पूजा-अनुष्ठान करते हैं। जुड़वा बेल फलों को गांव की बेटी मानकर तेल-हल्दी लगाकर विदाई दी जाती है। इसके बाद फलों को मां दंतेश्वरी के छत्र के साथ फूल रथ में रखा जाता है और अंत में दंतेश्वरी मंदिर में स्थापित किया जाता है।

दुर्गा अष्टमी की मध्यरात्रि में निशा जात्रा का आयोजन होता है। इस दिन रथ परिक्रमा नहीं होती। निशा जात्रा गुड़ी अथवा खमेश्वरी गुड़ी में क्षेत्रीय देवी-देवताओं की विशेष पूजा की जाती है। प्रदर्शनी के अनुसार इस अनुष्ठान में पारंपरिक रूप से 11 बकरों की बलि के साथ मछली और कुम्हड़ा आदि अर्पित किए जाते हैं। देवी-देवताओं के लिए 11 कांवड़ अर्थात 22 मटकियों में चावल, दाल और खीर का भोग तैयार किया जाता है। इस अवसर पर बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों से देवी-देवताओं के प्रतीक आंगा, लाट, पालकी, डोली और छत्र के साथ सिरहा तथा श्रद्धालु शामिल होते हैं। निशा जात्रा के बाद ये देवी-देवता भीतर रैनी और बाहर रैनी की रथ परिक्रमा में भाग लेते हैं।

मावली परघाव में मां दंतेश्वरी और मावली माता का भव्य स्वागत
 
मावली परघाव बस्तर दशहरा की प्रमुख स्वागत परंपरा है। इसमें दंतेवाड़ा से जगदलपुर आने वाली मावली माता की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र का भव्य स्वागत किया जाता है। मावली देवी को मां दंतेश्वरी का प्रतिरूप माना जाता है। रियासतकाल में महाराजा स्वयं पीली धोती और योगी वेश धारण कर नंगे पैर लगभग सात से आठ किलोमीटर दूर तक देवी की अगुवानी करने जाते थे। वर्तमान में डोली और छत्र वाहन से लाए जाते हैं। नवमी की शाम जिया डेरा से मावली देवी की डोली ढोल-नगाड़ों, लोकनृत्य, आरती और आतिशबाजी के साथ कुटरू बाड़ा पहुंचती है। यहां राजपरिवार, राजगुरु, राजपुरोहित, जनप्रतिनिधि और विभिन्न देवी-देवताओं के प्रतिनिधि स्वागत करते हैं। इसके बाद राजपरिवार और मुख्य पुजारी डोली को कंधों पर उठाकर राजमहल ले जाते हैं, जहां पूजा-अर्चना के बाद देवी के छत्र और डोली की स्थापना की जाती है। 

विजयादशमी के अवसर पर की जाती है पारंपरिक शस्त्रों की पूजा

विजयादशमी के अवसर पर मां दंतेश्वरी मंदिर में रियासतकालीन बंदूक, तलवार, तीर-कमान सहित पारंपरिक शस्त्रों की पूजा की जाती है। इस अवसर पर लगभग सात फीट लंबी कालवान बंदूक की भी पूजा होती है, जिसे वीरांगना मेघई रानी की स्मृति से जोड़ा जाता है। भीतर रैनी में आठ पहियों वाले विजय रथ की पहली परिक्रमा होती है। इसके बाद रथ को प्रतीकात्मक रूप से चुराकर रात में कुम्हड़ाकोट ले जाकर छिपाने की परंपरा है, जिसके बाद राजा के द्वारा रथ को खोजने के उपरांत रथ चुराने वाले माड़िया समुदाय द्वारा बस्तर दशहरा के कार्यक्रमों में आमंत्रित न किए जाने का दुःख तथा राजा के गलती मानने के उपरांत माड़िया समुदाय  के आग्रह पर उनके साथ नवा खाई की परंपरा है। इस रस्म को राजा तथा प्रजा के बीच सामंजस्य और राजा के द्वारा अपनी गलती को मानने की परंपरा यह बताती है कि प्रजा राजा से अधिक शक्तिशाली है और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी है।

एकादशी को बाहर रैनी के अंतर्गत राजपरिवार कुम्हड़ाकोट पहुंचकर नवाखानी की रस्म निभाते है। प्रदर्शनी में बताया गया कि इस अवसर पर बस्तर, छत्तीसगढ़ और अन्य क्षेत्रों से तीन हजार से अधिक देवी-देवताओं के प्रतीक एकत्र होते हैं। यहां नए अन्न का भोग अर्पित किया जाता है। रानी-माचा, तिहार-लाड़ी और भोग-लाड़ी जैसी परंपराएं भी निभाई जाती हैं। वापसी के दौरान विभिन्न स्थानों पर पूजा-अर्चना होती है। राजमहल के समीप पुलिस सलामी और महिलाओं की आरती के बाद मां दंतेश्वरी के छत्र को सम्मानपूर्वक मंदिर पहुंचाया जाता है।

मुरिया दरबार में दिखाई गई जनजातीय समाज की ऐतिहासिक जनसंवाद परंपरा

प्रदर्शनी का एक महत्वपूर्ण आकर्षण मुरिया दरबार की ऐतिहासिक परंपरा रही। मुरिया दरबार की शुरुआत 8 मार्च 1876 को हुई थी। रियासतकाल में यह राजा और जनता के बीच प्रत्यक्ष संवाद तथा समस्याओं के समाधान का वार्षिक मंच था। इसमें मांझी, मुखिया, चालकी और नाईक-पाईक, कोटवार, अपने क्षेत्रों की समस्याएं, शिकायतें और आवश्यकताएं राजा के सामने रखते थे। मांझी और चालकी आदिवासी समाज तथा राजसत्ता के बीच महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करते थे। मांझी परगना स्तर पर सामाजिक, धार्मिक और दशहरा संबंधी जिम्मेदारियां निभाते थे तथा लाल पगड़ी धारण करते थे। चालकी नीली पगड़ी पहनकर प्रशासनिक कार्यों, पुलिस सहयोग और जनसमस्याओं के समाधान में भूमिका निभाते थे। प्रदर्शनी में दी गई जानकारी के अनुसार वर्तमान में 80 मांझी और 25 चालकी पद है। यह परंपरा आज भी जनजातीय समाज की भागीदारी और संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बनी हुई है।

कुटुम्ब जात्रा में देवी-देवताओं का पारिवारिक मिलन
 
बस्तर दशहरा के अंतिम चरण में कुटुम्ब जात्रा का आयोजन होता है। स्थानीय परंपरा में कुटुम्ब का अर्थ परिवार है। इस अवसर पर दशहरा में शामिल होने आए विभिन्न क्षेत्रों के देवी-देवताओं को एक विशाल परिवार के रूप में एकत्र कर सम्मानपूर्वक विदाई दी जाती है।

गीदम रोड स्थित गंगामुंडा जात्रा स्थल के मावली मंडप में देवी-देवताओं की पूजा, पारंपरिक अर्पण, क्षमा-याचना और राज्य की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। पुजारियों को नवीन वस्त्र और भेंट देकर सम्मानित किया जाता है। इसी क्रम में काछिन जात्रा का आयोजन भंगाराम चौक से पथरागुड़ा मार्ग पर बांस मुंडा तालाब के समीप किया जाता है। यहां सिरहा, काछिन देवी और स्थानीय देवी-देवताओं के प्रतीकों की पूजा कर अगले वर्ष पुनः बस्तर दशहरा में शामिल होने की कामना के साथ विदाई दी जाती है।

माता की विदाई के साथ होता है महापर्व का समापन 

दंतेवाड़ा से आमंत्रित मां दंतेश्वरी का छत्र और मावली माता की डोली लगभग एक सप्ताह जगदलपुर में रहने के बाद भव्य शोभायात्रा के साथ विदा किए जाते हैं। सिंहद्वार पर पूजा-अर्चना, आरती और दर्शन के बाद राजपरिवार, पुजारी, जनप्रतिनिधि, लोक कलाकार और श्रद्धालुओं की सहभागिता से शोभायात्रा जिया डेरा तक पहुंचती है। मार्ग में पुष्पवर्षा, आरती और पुलिस सलामी दी जाती है। विदाई के दौरान मावली माता को बेटी की तरह मावली जोड़ा भेंट किया जाता है। इसमें श्रृंगार सामग्री, चावल-दाल, फल-फूल और अन्य पारंपरिक भेंट शामिल होती हैं।

दंतेवाड़ा वापसी के दौरान डोली तेतरखुटी स्थित गंगादेई माता मंदिर तथा तोकापाल की बासन बुंदिन माता मंदिर में दर्शन और परिक्रमा करती है। आंवराभाटा में रात्रि विश्राम के बाद दंतेवाड़ा नगर में प्रवेश से पहले बोधराज देव से अनुमति लेने की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद पूजा और पुलिस सलामी के साथ देवी की डोली मंदिर पहुंचती है।

जनजातीय समाज की सामूहिक सहभागिता और पारंपरिक ज्ञान का जीवंत दस्तावेज

बस्तर दशहरा प्रदर्शनी में यह विशेष रूप से रेखांकित किया गया कि महापर्व के आयोजन में विभिन्न जनजातीय एवं स्थानीय समुदायों की परंपरागत जिम्मेदारियां निर्धारित हैं। कोई समुदाय रथ निर्माण करता है, कोई लकड़ी उपलब्ध कराता है, कोई रथ के लिए रस्सी तैयार करता है, तो कोई पूजा सामग्री, देवी-देवताओं के स्वागत, आरती और धार्मिक अनुष्ठानों का निर्वहन करता है।
इस प्रकार बस्तर दशहरा केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वन संसाधनों का पारंपरिक उपयोग, लोक शिल्प, सामाजिक संगठन, महिला सहभागिता, जनसंवाद, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक श्रम का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के बस्तर दशहरा प्रदर्शनी अवलोकन का अवसर देश की समृद्ध जनजातीय सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। प्रदर्शनी के माध्यम से बस्तर की सदियों पुरानी परंपराओं, देवी-देवताओं के प्रति अटूट आस्था, जनजातीय समुदायों की विशिष्ट भूमिका और ऐतिहासिक सांस्कृतिक पहचान का व्यापक परिचय प्रस्तुत किया गया। बस्तर दशहरा की ये परंपराएं इस बात का जीवंत उदाहरण हैं कि किस प्रकार लोक आस्था, प्रकृति, संस्कृति और सामुदायिक सहभागिता मिलकर एक अद्वितीय सांस्कृतिक महापर्व को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखती हैं।

राष्ट्रपति मुर्मु ने बस्तर दशहरा प्रदर्शनी का तन्मयता के साथ अवलोकन किया और यहां की अनुपम लोक संस्कृति, सामाजिक समरसता और प्रकृति एवं आस्था के इस अद्भुत समन्वय की भूरि-भूरि प्रशंसा की।  इस अवसर पर राज्यपाल  रमेन डेका, मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय और उप मुख्यमंत्री  विजय शर्मा, संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री  राजेश अग्रवाल, वन मंत्री  केदार कश्यप, बस्तर सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष  महेश कश्यप, कांकेर सांसद भोजराज नाग, जगदलपुर विधायक  किरण सिंह देव, महापौर  संजय पाण्डे सहित अनेक जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। इस दौरान मुख्यमंत्री के सचिव  राहुल भगत, कमिश्नर  डोमन सिंह, आईजी बीएन मीणा, कलेक्टर  आकाश छिकारा, एसपी  शलभ सिन्हा सहित पारंपरिक मांझी-चालकी, मेंबर-मेंबरिन, नाइक-पाइक और बस्तर दशहरा समिति के सदस्य एवं गणमान्य नागरिक भी उपस्थित रहे।

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