Edited By Vikas Tiwari, Updated: 03 Apr, 2026 02:44 PM

छत्तीसगढ़ की लोकभाषाओं और बोलियों की समृद्ध परंपरा को लेकर साहित्य अकादमी और संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित ‘साहित्योत्सव 2026’ में वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती शकुंतला तरार ने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भाषा जहां मुकुट...
रायपुर (पुष्पेंद्र सिंह): छत्तीसगढ़ की लोकभाषाओं और बोलियों की समृद्ध परंपरा को लेकर साहित्य अकादमी और संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित ‘साहित्योत्सव 2026’ में वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती शकुंतला तरार ने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भाषा जहां मुकुट के समान है, वहीं छत्तीसगढ़ की बोलियाँ उस मुकुट में जड़ी अनमोल रत्न मणियों की तरह हैं, जो भाषा को सुंदरता और मजबूती प्रदान करती हैं।
नई दिल्ली में आयोजित इस साहित्योत्सव का शुभारंभ 30 मार्च को साहित्य अकादमी के अध्यक्ष श्री माधव कौशिक ने किया। 30 मार्च से 4 अप्रैल तक चलने वाले इस आयोजन में 100 से अधिक सत्रों में 650 से ज्यादा लेखक और विद्वान भाग ले रहे हैं। इसमें देश की 50 से अधिक भाषाओं का प्रतिनिधित्व हो रहा है। तरार ने कहा कि छत्तीसगढ़ी, सरगुजिहा, हल्बी, सादरी, गोंडी, कुडुख, भतरी, बंजारी, मुरिया, माड़िया, धुरवा, दोरला, कोरवा, बैगानी, भुंजिया, धनवारी और सावरा जैसी बोलियाँ न केवल भाषा को समृद्ध बनाती हैं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक पहचान को भी जीवंत रखती हैं। हर बोली का अपना अलग लहजा, लोकगीत और शब्दकोश होता है, जो उसे विशिष्ट बनाता है।
उन्होंने बताया कि जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में 18 स्थानीय बोलियों में कक्षा 1 से 5 तक शिक्षा का प्रावधान किया गया है, जिससे इन बोलियों का संरक्षण और संवर्धन सुनिश्चित हो रहा है। तरार ने पद्म विभूषण से सम्मानित पंडवानी गायिका तीजन बाई का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने अपनी कला के माध्यम से छत्तीसगढ़ी भाषा और लोकसंस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाई है। उन्होंने कहा कि बोलियाँ समाज का दर्पण होती हैं और इन्हें संरक्षित करना हमारी जिम्मेदारी है। कार्यक्रम में उपस्थित साहित्यकारों और भाषाविदों ने श्रीमती शकुंतला तरार के योगदान की सराहना करते हुए उन्हें बधाई दी।