Edited By Desh Raj, Updated: 13 Jun, 2026 10:52 PM

मध्य प्रदेश की तीसरी राज्यसभा सीट कांग्रेस के हाथ से निकल गई है। पर्याप्त संख्या बल होते हुए भी कांग्रेस को इस सीट को गंवाना पड़ा। हालांकि वोटिंग से पहले ही कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त हो गया और बीजेपी को बैठे बिठाए ये सीट...
(डेस्क): मध्य प्रदेश की तीसरी राज्यसभा सीट कांग्रेस के हाथ से निकल गई है। पर्याप्त संख्या बल होते हुए भी कांग्रेस को इस सीट को गंवाना पड़ा। हालांकि वोटिंग से पहले ही कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त हो गया और बीजेपी को बैठे बिठाए ये सीट मिल गई। इस सीट के मुद्दे को लेकर भाजपा और कांग्रेस में काफी बयानबाजी हो रही है और प्रदेश की सियासत से लेकर देश में ये मुद्दा बहुत ज्यादा गूंज रहा है। पहले जहां इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस बीजेपी पर तगड़े तरीके से हमलावर नजर आ रही थी वो अब कहीं न कहीं आपसी कलह में धार कम हो रही है। इस मामले को लेकर कई कांग्रेसी नेताओं के समर्थकों में भी आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला है। इसके साथ ही नामांकन निरस्त होने के बाद हुई प्रेस कांफ्रेस में दिग्विजय सिंह और प्रदेश प्रभारी में नोंकझोंक देखने को मिली थी और इसके बाद जीतू पटवारी के कहने के बाद भी दिग्विजय सिंह से प्रेस कांफ्रेस में कुछ नहीं बोला था।
दिग्विजय के मना करने के बाद इस सीट पर हलचल बढ़ी
इन सब मुद्दों और राजनीति के बीच हम बात करेंगे दिग्विजय सिंह की। जी हां दिग्विजय सिंह की इसलिए क्योंकि इस सीट से दिग्विजय सिंह ही सांसद थे और उनके मना करने के बाद ही इस सीट पर कांग्रेस की बेचैनी बढ़ गई थी और इस सीट पर कई दावेदार दावा ठोकते नजर आए। इस सीट पर दावेदारी को लेकर कांग्रेस के पूर्व मंत्री से लेकर कई नेताओं के बयान आए। दिग्विजय सिंह के पीछे हटने के बाद कांग्रेस की ये सीट आसान से आने के बजाय संघर्ष में तब्दील होने लगी और यहीं से बीजेपी को मौका मिला।
दिग्गी ही चुनाव लड़ते तो शायद बच जाती कांग्रेस की ये सीट

इस सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह राज्यसभा में कांग्रेस की लड़ाई लड़ रहे थे लेकिन हलचल तब मची जब कुछ महीने पहले ही दिग्विजय सिंह ने राज्यसभा जाने से मना कर दिया और ये ऐलान कर दिया कि वो अबकी बार इस सीट से चुनाव नहीं लड़ेंगे। दिग्गी के इस फैसले के बाद कांग्रेस में भी नए नेता और योग्य प्रत्याशी के लिए सुगबुगाहट शुरु हो गई। दिग्गी के पीछे हटने के ऐलान के साथ ही कांग्रेस में कई नेता इस सीट से चुनाव लड़ने के लिए तैयार होने लगे। कांग्रेस के लिए आसान दिखने वाली ये सीट दिग्विजय के मना करने के बाद सियासी जंग का मैदान बनने लग गई। कई नेता इस सीट से अपने-अपने जुगाड़ और गोटियां फिट करने लगे जिससे कांग्रेस नेतृत्व को ही इस सीट पर कैंडिडेट चयन करना मुश्किल साबित होने लगा। कांग्रेस को ऐसा उम्मीदवार ढूंढने के लिए मेहनत करनी पड़ी जो सर्वमान्य हो और पार्टी में असंतोष भी खत्म करे। कमलनाथ, जीतू पटवारी, सज्जन सिंह वर्मा से लेकर मीनाक्षी नटराजन और कई और नाम सामने आने लगे। यहीं से इस सीट पर मेहनत कम और दावेदारी जताने वाले बढ़ गए।
बीजेपी के प्लान के आगे ढह गई कांग्रेस

जैसे ही राज्यसभा की इस तीसरी सीट के लिए कांग्रेस में दावेदारों को लेकर घमासान मचने लगा तो बीजेपी एक्टिव मोड में आ गई और उसके मन में इस सीट पर भी जीत हासिल करने का अरमान जागा। कांग्रेस की कलह का बीजेपी ने फायदा उठाने का काम करना शुरु कर दिया औऱ बीजेपी तीसरी सीट को भी जीतने वाले बयान देने लग गई। इस दौरान क्रास वोटिंग का मुद्दा भी छा गया और कांग्रेस को डर सताने लगा कि कहीं उसके विधायक ऐसा काम न कर दें जिससे इस सीट पर उनकी किरकरी हो जाए। बीजेपी ने नांमाकन से पहले ही ऐसा माहौल बना दिया कि कांग्रेस का सारा ध्यान क्रास वोटिंग और अपने विधायकों को बचाने में लग गया। इस की नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन के बाद कोई डम्मी कैंडिडेट तक नहीं भरा।
कांग्रेस की गलतियों पर उठाए जा रहे सवाल

बीजेपी के बुने धागे में कांग्रेस ऐसी फंसी की उसका सारा ध्यान विधायकों को खरीद फरोख्त से बचाने मे लग गया औऱ वो अपने विधायकों को वोटिंग वाले दिन तक बैंगलुरू भेजने के लिए विवश हो गई। इसी उधेडबुन में कांग्रेस अपना डम्मी कैंडिडेट तक भरना भूल गई। फिर किसी तरह से बीजेपी ने ऐन मौके पर मीनाक्षी नटराजन के चुनावी हलफनामे में अपराधिक मामले को सामने लाकर अपना अंतिम मोहरा फैंक दिया जिससे कांग्रेस चारों खाने चित हो गई।
दिग्विजय सिंंह का मना और बीजेपी की रणनीति
इस पूरे मामले पर गौर किया जाए तो ये कहा जा सकता है कि यदि दिग्विजय सिंह ने राज्यसभा जाने से मना न किया होता, और वो खुद इस सीट पर चुनाव लड़ते तो इसको कांग्रेस से छीनना आसान नहीं था। पहली बात तो ये कि दिग्विजय सिंह जैसे कद्दावर नेता के चुनाव लड़ने से न तो क्रॉस वोटिंग की आशंका कांग्रेस को घेरती और न ही नामांकन निरस्त जैसी को घटना घटती। उनके मना करने के बाद ही कांग्रेस में दावेदारों की संख्या बढ़ने लगी और गुटबाजी भी दिखाई देने लगी। बीजेपी का क्रॉस वोटिंग शिगूफा भी हवा में तभी तैरने लगा जब बीजेपी को कुछ संभावना नजर आने लगी,क्योंकि अगर दिग्गी ही इस सीट से होते तो शायद बीजेपी कुछ ज्यादा प्लान नहीं कर पाती।