Edited By Himansh sharma, Updated: 13 Sep, 2026 02:25 PM
छत्तीसगढ़ के सुदूर उत्तरी अंचल जशपुर में बदलाव की एक नई तस्वीर गांवों के बीच आकार ले रही है।
जशपुर। छत्तीसगढ़ के सुदूर उत्तरी अंचल जशपुर में बदलाव की एक नई तस्वीर गांवों के बीच आकार ले रही है। पीढ़ियों से घरों में सहेजा गया बुनाई का हुनर अब केवल परंपरा निभाने तक सीमित नहीं रहना चाहता; उसे आय, रोजगार और छोटे उद्यम की ताकत में बदलने की तैयारी है। इस बदलाव के केंद्र में घोलेंग का आजीविका परिसर है, जहां स्थानीय महिलाओं के पारंपरिक कौशल को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप नया रूप देने की कोशिश हो रही है। घोलेंग में करीब 35 से 40 ग्रामीण परिवारों और स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को हैंडलूम और टेक्सटाइल से संबंधित प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यहां सीखने के साथ उत्पादन पर भी जोर है, ताकि प्रशिक्षण पूरा होने के बाद कौशल केवल प्रमाणपत्र बनकर न रह जाए, बल्कि उत्पाद और फिर आय में बदल सके। शॉल, साड़ी और अन्य उपयोगी वस्तुओं के निर्माण के साथ महिलाओं को आधुनिक तकनीक, डिजाइन और गुणवत्ता की समझ देने की दिशा में काम किया जा रहा है।
घोलेंग की यह कहानी उस बड़े बदलाव की स्थानीय तस्वीर है, जिसमें देश के पारंपरिक कौशल को आधुनिक तकनीक, बाजार और उद्यमिता से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हथकरघा क्षेत्र को ग्रामीण आजीविका और महिला-नेतृत्व वाले विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए पारंपरिक कौशल को नई पीढ़ी और बदलते बाजार से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
घोलेंग में प्रशिक्षण से आगे की तैयारी
घोलेंग में चल रही पहल की खास बात यह है कि यहां प्रशिक्षण को अंतिम लक्ष्य नहीं माना गया है। प्रशिक्षण के साथ उत्पादन और बाजार की तैयारी पर भी काम किया जा रहा है। महिलाएं आधुनिक तकनीक और मशीनों के इस्तेमाल से कपड़ा तैयार करने के साथ शॉल, साड़ी और दूसरे उपयोगी उत्पाद बनाना सीख रही हैं। साथ ही उत्पाद की गुणवत्ता, डिजाइन और बाजार की मांग को समझने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। यह पहल आदित्य बिड़ला समूह, जिला प्रशासन, बिहान और टेक्सटाइल स्किल सेक्टर काउंसिल के संयुक्त प्रयास से आगे बढ़ रही है। घोलेंग में विकसित किए जा रहे हैंडलूम प्रशिक्षण एवं उत्पादन केंद्र का उद्देश्य पारंपरिक हस्तकरघा से जुड़े परिवारों को आधुनिक मशीनरी और तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ उत्पादों की गुणवत्ता, डिजाइन, परीक्षण और बाजार तक पहुंच को बेहतर बनाना है।
जब हुनर के साथ बाजार की समझ भी मिले
ग्रामीण क्षेत्रों में कौशल प्रशिक्षण की सबसे बड़ी चुनौती प्रशिक्षण के बाद रोजगार या बाजार से जुड़ने की होती है। घोलेंग में इसी कड़ी को मजबूत करने की कोशिश है। कपड़ा तैयार करना सीखना एक पहला कदम है। इसके बाद सवाल आता है कि कौन-सा उत्पाद बाजार में चलेगा, उसका डिजाइन कैसा होगा, गुणवत्ता कैसे कायम रखी जाएगी और उसे ग्राहक तक कैसे पहुंचाया जाएगा। इसीलिए घोलेंग में प्रशिक्षण को उत्पादन और बाजार से जोड़ने पर जोर है। बेहतर डिजाइन और गुणवत्ता के साथ स्थानीय उत्पादों को व्यापक बाजार तक ले जाने की तैयारी की जा रही है। इससे जशपुर के पारंपरिक हुनर को स्थानीय हाट या आसपास के बाजार से आगे ले जाकर बड़े बाजार से जोड़ने की संभावना बनती है।

प्रधानमंत्री की सोच का स्थानीय रूप
भारत में हथकरघा केवल कपड़ा बनाने की व्यवस्था नहीं है। यह लाखों परिवारों की आजीविका और देश की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा क्षेत्र है। केंद्र सरकार के अनुसार देश में 35.22 लाख बुनकर और संबद्ध कामगार हथकरघा क्षेत्र से जुड़े हैं और इनमें 72 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने देश की बुनाई परंपरा और कारीगरों के कौशल को भारत की ताकत बताते हुए हथकरघा क्षेत्र के लिए सरकार के समर्थन को दोहराया। उन्होंने लोगों से भारतीय हथकरघा उत्पादों को अपनाने और उन्हें बढ़ावा देने की अपील भी की। प्रधानमंत्री ने जिस दिशा में विरासत और तकनीक, रचनात्मकता और उद्यमिता को जोड़ने की बात कही, घोलेंग में उसी सोच को स्थानीय स्तर पर आकार देने की कोशिश दिखाई देती है।
छत्तीसगढ़ में ‘लोकल’ से ‘ग्लोबल’ की ओर
जशपुर की यह पहल छत्तीसगढ़ में हथकरघा क्षेत्र को नई पहचान देने की व्यापक कोशिश से भी जुड़ती है। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने छत्तीसगढ़ राज्य हथकरघा संघ के प्रीमियम ब्रांड ‘कोशल फैब’ की शुरुआत की। इसके साथ ब्रांड का लोगो और कैटलॉग जारी किया गया तथा हैंडलूम इन्वेंट्री मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर भी शुरू किया गया। राज्य सरकार का जोर छत्तीसगढ़ के कोसा और पारंपरिक हथकरघा उत्पादों को आधुनिक डिजाइन, ब्रांडिंग और बेहतर बाजार के जरिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने पर है।
जशपुर स्वावलंबी मॉडल
घोलेंग की पहल में महिलाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं यदि प्रशिक्षण के बाद उत्पादन गतिविधियों में लगातार भाग लेती हैं, तो समूह आधारित उद्यम की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
इससे काम का बंटवारा, सामूहिक उत्पादन, उत्पादों की गुणवत्ता और बाजार तक पहुंच को व्यवस्थित किया जा सकता है। स्थानीय स्तर पर युवाओं को भी टेक्सटाइल क्षेत्र का प्रशिक्षण देने से उनके लिए रोजगार और स्वरोजगार के विकल्प बढ़ सकते हैं।
इस मॉडल की एक बड़ी संभावना यह है कि रोजगार गांव से शहर की ओर जाने के बजाय गांव में ही पैदा हो। महिला अपने घर और समुदाय के आसपास रहते हुए कौशल अर्जित करे, उत्पाद बनाए और उसे बाजार तक पहुंचाए—ग्रामीण अर्थव्यवस्था में यह बदलाव छोटा दिखाई दे सकता है, लेकिन परिवार की आय और महिला की निर्णय क्षमता पर इसका असर बड़ा हो सकता है।
छोटे गांवों के हुनर को बड़े आर्थिक अवसर से जोड़ने की कोशिश
छत्तीसगढ़ के आर्थिक परिदृश्य में स्थानीय कौशल और छोटे उद्यमों की भूमिका को भी नए संदर्भ में देखा जा रहा है। NITI Aayog के Investment Friendliness Index 2026 में छत्तीसगढ़ को 47.5 अंक मिले हैं और वह बड़े राज्यों में 9वें तथा कुल 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 12वें स्थान पर रहा। रिपोर्ट में राज्य की प्राकृतिक संसाधन क्षमता और पर्यावरणीय मजबूती को प्रमुख ताकतों में गिना गया है।
लेकिन किसी राज्य की अर्थव्यवस्था केवल बड़े निवेश और बड़े उद्योगों से नहीं बनती। गांवों में मौजूद छोटे उद्यम, महिला समूह, कारीगर और स्थानीय उत्पाद भी आर्थिक गतिविधि की महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। जशपुर का टेक्सटाइल क्षेत्र इसी संभावना को सामने लाता है—जहां स्थानीय संसाधन और पारंपरिक कौशल आधुनिक प्रशिक्षण, डिजाइन, उत्पादन और बाजार से जुड़कर आय का नया मॉडल बना सकते हैं।
बदलाव की असली तस्वीर महिलाओं के हाथों में
घोलेंग में हो रहा काम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां विकास का पैमाना केवल मशीनों की संख्या या प्रशिक्षण लेने वालों की संख्या नहीं है। असली बदलाव तब दिखाई देगा जब किसी महिला का सीखा हुआ कौशल उसके परिवार की आय बढ़ाएगा, जब कोई युवा इसी क्षेत्र में अपना काम शुरू करेगा और जब जशपुर में तैयार उत्पाद किसी बड़े बाजार में अपनी पहचान बनाएगा।
जशपुर की कहानी इस अर्थ में देश के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत के दूर-दराज के गांवों में सदियों से मौजूद हुनर को यदि आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण, डिजाइन, डिजिटल व्यवस्था और बाजार से जोड़ा जाए तो वही परंपरा नई अर्थव्यवस्था का आधार बन सकती है।