Edited By Desh sharma, Updated: 30 Jan, 2026 10:44 PM

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बेहद ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है। इस फैसले में कोर्ट ने साफ कर दिया है कि केवल किसी व्यक्ति की जाति का नाम लेना ही अपराध नहीं हो जाता है। कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत...
(बिलासपुर): छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बेहद ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है। इस फैसले में कोर्ट ने साफ कर दिया है कि केवल किसी व्यक्ति की जाति का नाम लेना ही अपराध नहीं हो जाता है। कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध नहीं बनता। जब तक यह साबित न हो कि ऐसा सार्वजनिक स्थान पर जानबूझकर अपमान करने के मकसद न किया गया हो। कोर्ट ने 16 साल पुराने मामले में सुनवाई करते हुए ये अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने सत्र न्यायालय द्वारा दी गई सजा को निरस्त करते हुए आरोपी को बरी भी कर दिया।
जानकारी के मुताबिक 2008 को पथरिया स्थित छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल सब-स्टेशन में पदस्थ जूनियर इंजीनियर उत्तरा कुमार धृतलहरे ने शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया था कि दुर्गा पूजा के लिए चंदा मांगे जाने पर आरोपी मनोज पांडे ने इनकार कर दिया था और कथित रूप से जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया। मामला न्यायालय पहुंचा और सत्र न्यायालय ने 28 अगस्त 2010 को आरोपी को एससी/एसटी अधिनियम की धारा के तहत दोषी ठहरा दिया था।
मामला हाईकोर्ट पहुंचा और हाईकोर्ट में अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि सभी स्वतंत्र गवाह अभियोजन के पक्ष में नहीं आए। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने केवल शिकायतकर्ता के बयान पर ही दोषी ठहरा दिया। तर्क ये भी था कि आईपीसी की सभी धाराओं से आरोपी को बरी करने के बाद भी केवल एससी/एसटी एक्ट के तहत दोषी ठहरा दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन सिद्ध करने में असफल रहा है कि आरोपी द्वारा कथित रूप से बोले गए शब्द सार्वजनिक स्थान पर जानबूझकर अपमानित करने के मकसद से कहे गए।
केवल जाति का उल्लेख करना, बिना अपमान , एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अंतर्गत अपराध नहीं बनता है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि जब स्वतंत्र गवाहों ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया है। लिहाजा हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के निर्णय को बदलते हुए मनोज पांडे को दोषमुक्त किया। ये फैसला अपने आप में ही खास समझा जा रहा है।