Edited By Himansh sharma, Updated: 23 Oct, 2026 07:30 PM

मध्य प्रदेश में जैसे-जैसे नगरीय निकाय चुनाव की तैयारी तेज हो रही है, वैसे-वैसे राजनेताओं के बीच 'वर्चस्व की जंग' (Power Struggle) खुलकर सामने आने लगी है।
भोपाल: मध्य प्रदेश में जैसे-जैसे नगरीय निकाय चुनाव की तैयारी तेज हो रही है, वैसे-वैसे राजनेताओं के बीच 'वर्चस्व की जंग' (Power Struggle) खुलकर सामने आने लगी है। यह चुनाव सिर्फ पार्षदों या अध्यक्षों का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय विधायकों (MLAs) और कद्दावर मंत्रियों के लिए भी अपनी साख बचाने का लिटमस टेस्ट बन गया है। राजधानी भोपाल से लेकर इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर तक के सियासी गलियारों में इस बात की सबसे ज्यादा चर्चा है कि टिकट वितरण में किसकी लाठी चलेगी।
विधायक बनाम संगठन: अपनों को उपकृत करने की होड़
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विधानसभा चुनावों के बाद विधायकों के लिए यह पहला मौका है जब वे अपने चहेते कार्यकर्ताओं और करीबियों को नगर पालिकाओं और परिषदों में 'सैटल' कर सकें।
दबाव की राजनीति और बगावत का डर
पार्टी सूत्रों की मानें तो कई क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर यह दबाव देखा जा रहा है कि उनके क्षेत्र के वार्डों में टिकट स्थानीय समीकरणों के आधार पर बंटे। ऐसे में आलाकमान (BJP-Congress दोनों) के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अगर समन्वय नहीं बैठा, तो सालों से दरी बिछा रहे निष्ठावान कार्यकर्ता बगावत कर सकते हैं या निर्दलीय चुनाव मैदान में कूदकर खेल बिगाड़ सकते हैं।
सीधे चुनाव से बढ़ा रिस्क
चूंकि इस बार महापौर और अध्यक्ष पदों के चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली (सीधे जनता द्वारा) से कराए जाने की चर्चाएं और तैयारियां तेज हैं, इसलिए पार्टियों के लिए एक-एक वार्ड का गणित बैठना बेहद जरूरी है। अगर वार्ड स्तर पर भितरघात या बगावत हुई, तो इसका सीधा असर मुख्य पद के उम्मीदवार के वोट बैंक पर पड़ सकता है। यही वजह है कि दोनों ही दलों के बड़े नेता इस समय फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।