राष्ट्रपति मुर्मु पहुंचीं बैतूल, कहा- विकास और संस्कृति का संतुलन ही सशक्त-समृद्ध समाज की आधारशिला होता है

Edited By Vandana Khosla, Updated: 18 Jun, 2026 03:27 PM

president murmu arrived in betul stated that a balance between development and

भोपाल/बैतूल। 'समाज का सशक्तिकरण केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं होना चाहिए। वास्तविक सशक्तिकरण तब होता है जब व्यक्ति में आत्मविश्वास, आत्मसम्मान, जागरूकता और दायित्वबोध का विकास हो। जनजातीय समाज आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने वाला समाज है और उसकी यही...

भोपाल/बैतूल। 'समाज का सशक्तिकरण केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं होना चाहिए। वास्तविक सशक्तिकरण तब होता है जब व्यक्ति में आत्मविश्वास, आत्मसम्मान, जागरूकता और दायित्वबोध का विकास हो। जनजातीय समाज आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने वाला समाज है और उसकी यही विशेषता उसे विशिष्ट बनाती है। आध्यात्मिक जागृति व्यक्ति को अपनी आंतरिक शक्ति का अनुभव कराती है तथा सकारात्मक सोच को जीवन के उच्च आदर्शों से जोड़ती है। विकास और संस्कृति का संतुलन ही किसी भी सशक्त और समृद्ध समाज की आधारशिला होता है। यह बात देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 18 जून को बैतूल में कही। राष्ट्रपति मुर्मु ब्रह्माकुमारी संस्थान द्वारा आयोजित एम्पावरमेंट ऑफ ट्राइबल सोसाइटी बाय स्पिरिचुअल अवेकनिंग कार्यक्रम को संबोधित कर रही थीं। बता दें, राष्ट्रपति मुर्मु 5 दिवसीय मध्यप्रदेश के दौरे पर हैं। अपने प्रवास के पहले दिन उन्होंने बैतूल का दौरा किया। कार्यक्रम के मंच पर आने से पहले उन्होंने धार्मिक पवित्रता के प्रतीक और औषधीय गुणों से भरपूर रुद्राक्ष का पौधा रोपित कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। मंच पर आते ही गोंडी जनजातीय कड़पड़ा दल के कलाकारों ने परंपरागत लोक नृत्‍य की प्रस्‍तुती कर राष्ट्रपति का स्वागत किया। बैतूल आने से पहले मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राष्ट्रपति मुर्मु का इंदौर एयरपोर्ट पर स्वागत किया। सीएम डॉ. यादव ने कहा कि राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु का दौरा मध्यप्रदेश के लिए अहम है।

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कार्यक्रम में राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि भारत ने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति तभी संभव है जब देश का कोई भी वर्ग विकास की मुख्यधारा से पीछे न रह जाए। हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक भारत की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत सुरक्षित और अक्षुण्ण रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जन-जातीय समाज को भ्रमित करने के प्रयास भी समय-समय पर किए जाते हैं, ऐसे में ब्रह्माकुमारी संस्थान द्वारा आयोजित इस प्रकार के सम्मेलन जनजातीय समाज के आध्यात्मिक उत्थान, सामाजिक जागरूकता और समग्र विकास के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगे। राष्ट्रपति मुर्मु ने मध्यप्रदेश शासन की सराहना करते हुए कहा कि प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जनजातीय कल्याण के लिए अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं। उन्होंने विशेष रूप से सिकल सेल एनीमिया का उल्लेख करते हुए कहा कि जनजातीय क्षेत्रों में इस बीमारी की संभावना अधिक पाई जाती है और इसके उन्मूलन के लिए प्रभावी प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इन प्रयासों से जन-जातीय समाज का स्वास्थ्य स्तर और बेहतर होगा।

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पूरे देश के लिए अहम है यह कार्यक्रम
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि मध्यप्रदेश का बैतूल जिला अपनी समृद्ध जनजातीय संस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक चेतना के लिए पूरे देश में विशेष पहचान रखता है। यहां के जनजातीय समुदायों ने अपनी परंपराओं, लोकज्ञान और सांस्कृतिक मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित रखा है। सामूहिकता, सहयोग, सरलता, ईमानदारी और आध्यात्मिकता जैसे उच्च जीवन मूल्यों का जीवंत स्वरूप बैतूल की जनजातीय संस्कृति में दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि जनजातीय समुदाय के सशक्तिकरण के लक्ष्य पर केंद्रित इस महासम्मेलन में शामिल होकर उन्हें अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। यह आयोजन केवल बैतूल या मध्यप्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश और समाज के लिए विशेष महत्व रखता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि महासम्मेलन में तैयार होने वाली कार्य योजनाएं जनजातीय समाज को राष्ट्र की प्रगति का सशक्त भागीदार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

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भागती-दौड़ती दुनिया में बढ़ गया अध्यात्म का महत्व
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि ब्रह्माकुमारी संस्थान ने मातृशक्ति को केंद्र में रखकर अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया है। संस्थान की आंतरिक शुचिता, मानवीय गरिमा, सेवा भावना तथा प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता समाज के लिए प्रेरणादायी है। उन्होंने कहा कि आज की भागदौड़ भरी दुनिया में आंतरिक शुचिता और आध्यात्मिक मूल्यों का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। इन्हीं मूल्यों के आधार पर समाज में समतापरक आचरण, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की भावना विकसित होती है। वर्तमान समय में जब विश्व तनाव, संघर्ष और युद्ध जैसी परिस्थितियों का सामना कर रहा है, तब ऐसे आयोजनों की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ जाती है। जनजातीय समुदाय की जीवनशैली स्वाभाविक रूप से आध्यात्मिक मूल्यों और प्रकृति के निकट रही है। जनजातीय समाज, जिसे आदिवासी समाज भी कहा जाता है, सृष्टि के आरंभ से ही धरती के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीता आया है। यह समाज सुख, शांति, आनंद और प्रेम के साथ जीवन जीना जानता है तथा हिंसा से दूर रहता है। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज प्रकृति ही नहीं, बल्कि पंचतत्वों, धरती, आकाश, वायु, जल, सूर्य और चंद्रमा, को पूजनीय मानता है। इनके लिए किसी विशेष मंदिर या पूजा स्थल की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि पूरी प्रकृति ही उनके लिए आराधना का केंद्र है।

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वायु के बिना जीवन की कल्पना नहीं
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि धरती, जल और वायु के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। जनजातीय समाज प्रकृति को नुकसान पहुंचाने के बजाय उसका संरक्षण करता है। वे धरती को क्षति नहीं पहुंचाते, जल स्रोतों को प्रदूषित नहीं करते और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग भी आवश्यकता के अनुसार करते हैं। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज किसी भी संसाधन के उपयोग से पहले प्रकृति को नमन करता है। यही कारण है कि उनकी जीवनशैली पर्यावरण संरक्षण का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करती है। आज जब पेड़-पौधों, नदियों और समुद्रों के संरक्षण की आवश्यकता पूरी दुनिया महसूस कर रही है, तब जनजातीय समाज की जीवन पद्धति मानवता के लिए मार्गदर्शक बन सकती है। उन्होंने कहा कि रासायनिक उर्वरकों और विदेशी कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग भूमि की उर्वरता को नष्ट कर रहा है तथा इसके कारण अनेक प्रकार की बीमारियां भी बढ़ रही हैं। प्राकृतिक खेती भारत की मूल परंपरा रही है और आज देश पुनः उसी दिशा में लौट रहा है। प्राकृतिक खेती न केवल स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है, बल्कि यह मन, शरीर और आध्यात्मिक चेतना को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।

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जन-जातीय युवाओं को डिजिटल सशक्तिकरण से जोड़ना आवश्यक
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि तेजी से बदलते वर्तमान दौर में जन-जातीय युवाओं को आधुनिक शिक्षा, कौशल विकास और डिजिटल सशक्तिकरण से जोड़ना आवश्यक है, ताकि वे विकास की नई संभावनाओं का लाभ उठा सकें। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उनकी सांस्कृतिक पहचान, परंपराएं और आध्यात्मिक विरासत सुरक्षित बनी रहे। विकास और संस्कृति का संतुलन ही किसी भी सशक्त और समृद्ध समाज की आधारशिला होता है। शाश्वत विकास वही है जो हमारी जड़ों को मजबूत बनाते हुए भविष्य की संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त करे। जब सेवा और अध्यात्म का संगम होता है, तब समाज में स्थायी और सकारात्मक परिवर्तन संभव होता है। यह महासम्मेलन उसी संगम का सशक्त उदाहरण है और समाज को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने सभी नागरिकों से वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण के लिए अधिक प्रतिबद्धता और समर्पण के साथ कार्य करने का आह्वान करते हुए कहा कि सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, आध्यात्मिक चेतना और मानव कल्याण ही समावेशी एवं विकसित भारत की आधारशिला बनेंगे।

प्रदर्शनी की किया अवलोकन
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कार्यक्रम में प्रदर्शनी-स्टॉल का अवलोकन किया। बैतूल जिले की स्व सहायता समूह की महिलाएं सतपुडांचल प्रोड्यूसर कंपनी के माध्यम से रागी, कोदो, कुटकी ज्वार एवं बाजरा जैसे पोषक तत्वों से भरपूर मिलेटस से कुकीज, पास्ता, नूडल्स, इंस्टेंट इडली दोसा, मिक्स दलिया तथा अन्य स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों का निर्माण कर रही है। सतपुडांचल प्रोड्यूसर कंपनी में 175 स्व सहायता समूह के 2075 समूह सदस्य जुड़े हैं। सभी ग्रुप एक साथ जुड़कर हर महीने 8 से 10 हजार रुपए की अतिरिक्त आय कर रहे हैं। राष्ट्रपति ने भरेवा शिल्प कला के स्टॉल का भी अवलोकन किया। जनजातीय महिलाओं द्वारा पीतल, तांबा, कांसा आदि से निर्मित विशिष्ट धातु शिल्प कृतियों को प्रदर्शित किया गया था। राष्‍ट्रपति ने इस दौरान वन आधारित उत्पादों के स्टॉल का भी अवलोकन किया। स्टॉल में मुख्य रूप से नांदा फॉरेस्ट हनी, बैतूल सागौन और कुकरु कॉफी के माध्यम से आजीविका उद्यमिता एवं वोकल फॉर लोकल की भावना को सशक्त रूप में प्रदर्शित किया गया था। राष्ट्रपति ने विशेष रूप से श्री अन्न से बने व्यंजनों की पोषण प्रदर्शनी का भी निरीक्षण किया। इस प्रदर्शनी में 18 प्रकार के पौष्टिक व्यंजन प्रदर्शित किए गए थे।

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