राज्य को जल्द मिलेगा नया DGP, इस वरिष्ठ IPS अधिकारी का नाम सबसे आगे

Edited By Himansh sharma, Updated: 06 Apr, 2026 07:27 PM

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छत्तीसगढ़ में लंबे समय से लंबित पुलिस महानिदेशक (DGP) की स्थायी नियुक्ति अब जल्द हो सकती है।

रायपुर: छत्तीसगढ़ में लंबे समय से लंबित पुलिस महानिदेशक (DGP) की स्थायी नियुक्ति अब जल्द हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के नोटिस की समय-सीमा समाप्त होने के बाद राज्य सरकार पर निर्णय लेने का दबाव बढ़ गया है। इस दौड़ में प्रभारी DGP अरुण देव गौतम का नाम सबसे आगे माना जा रहा है, जबकि IPS हिमांशु गुप्ता भी रेस में शामिल हैं।दरअसल, UPSC ने राज्य सरकार से पूछा था कि अब तक नियमित DGP की नियुक्ति क्यों नहीं की गई। साथ ही 3 जुलाई 2018 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए स्पष्ट किया गया था कि राज्यों में ‘प्रभारी’ DGP की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। अब समय-सीमा खत्म होने के बाद सरकार जल्द फैसला ले सकती है।

दो नामों का पैनल, गौतम का पलड़ा भारी

UPSC ने 13 मई 2025 को दो वरिष्ठ IPS अधिकारियों—अरुण देव गौतम (1992 बैच) और हिमांशु गुप्ता (1994 बैच)—का पैनल राज्य सरकार को भेजा था। आमतौर पर तीन नाम भेजे जाते हैं, लेकिन इस बार सीमित विकल्पों के कारण केवल दो ही नाम शामिल किए गए। सूत्रों के मुताबिक अनुभव और प्रशासनिक पकड़ के चलते गौतम का पलड़ा भारी है।

प्रभारी से स्थायी DGP बनने की ओर

पूर्व DGP अशोक जुनेजा के 4 फरवरी 2025 को रिटायर होने के बाद अरुण देव गौतम को प्रभारी DGP बनाया गया था। हालांकि, प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि DGP की नियुक्ति तय प्रक्रिया के तहत नियमित रूप से होनी चाहिए।

इसके अलावा 5 फरवरी 2026 को टी. धंगोपल राव बनाम UPSC मामले की सुनवाई में कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि नियुक्ति में देरी पर अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी।

अरुण देव गौतम: चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारियों के अधिकारी

उत्तर प्रदेश के कानपुर निवासी अरुण देव गौतम का करियर बेहद प्रभावशाली रहा है। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और जेएनयू से अंतरराष्ट्रीय कानून में एमफिल किया। 1992 बैच के IPS अधिकारी गौतम ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं।

वे भोपाल सहित 6 जिलों में एसपी रह चुके हैं और नक्सल प्रभावित इलाकों—राजनांदगांव और बस्तर—में भी अहम भूमिका निभा चुके हैं। 2009 के नक्सली हमले के बाद उन्हें राजनांदगांव भेजा गया, जबकि झीरम कांड के बाद बस्तर IG के रूप में उन्होंने जिम्मेदारी संभाली।

सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन क्या कहती है?

सुप्रीम कोर्ट के 2006 के फैसले के अनुसार:

DGP की नियुक्ति UPSC द्वारा सुझाए गए वरिष्ठ अधिकारियों में से की जाएगी, चयनित अधिकारी का कार्यकाल कम से कम 2 साल का होगा, ‘प्रभारी’ DGP की व्यवस्था मान्य नहीं है
अब नजर सरकार के फैसले पर,कानूनी दबाव और प्रशासनिक जरूरतों को देखते हुए माना जा रहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार जल्द ही स्थायी DGP के नाम पर मुहर लगा सकती है। अगर ऐसा होता है तो अरुण देव गौतम का नाम सबसे मजबूत दावेदार के रूप में सामने है।

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