Edited By Himansh sharma, Updated: 12 Oct, 2026 12:32 PM

मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के कोसमी गांव में आदिवासी परिवारों के घर तोड़े जाने का मामला अब राजनीतिक बहस का विषय बन गया है
सीहोर: मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के कोसमी गांव में आदिवासी परिवारों के घर तोड़े जाने का मामला अब राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। केंद्रीय कृषि मंत्री और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस घटना पर नाराजगी जताते हुए कहा कि प्रभावित परिवार हमेशा बीजेपी को वोट देते हैं और इन्हीं के वोट से मोहन यादव मुख्यमंत्री बने हैं। शिवराज के इस बयान के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है - क्या बीजेपी को वोट देने वालों के घर ही सुरक्षित रहेंगे और बाकी लोगों के घरों पर कार्रवाई होती रहेगी?
अगर कोई परिवार बीजेपी का समर्थक नहीं है, तो क्या उसके घर टूटने पर सरकार और जनप्रतिनिधियों को तकलीफ नहीं होनी चाहिए? लोकतंत्र में किसी नागरिक के अधिकार उसकी राजनीतिक पसंद से तय नहीं होते। सरकार की जिम्मेदारी हर नागरिक के साथ समान व्यवहार करना है, चाहे वह किसी भी पार्टी को वोट देता हो।
घर किसी पार्टी का नहीं, परिवार का होता है!
कोसमी गांव में आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े जाने और फसलें कुचले जाने की घटना ने प्रशासनिक कार्रवाई के तरीके पर भी सवाल खड़े किए हैं। यदि जमीन पर अतिक्रमण है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया, प्रभावित परिवारों के अधिकारों और मानवीय पहलुओं का ध्यान रखना भी जरूरी है। यहां सवाल सिर्फ बीजेपी के वोटरों का नहीं, बल्कि उन सभी गरीब और आदिवासी परिवारों का है, जिनका आशियाना किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई से प्रभावित हो सकता है।
शिवराज सिंह चौहान करीब 18 साल तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं और अब केंद्र सरकार में मंत्री हैं। ऐसे में उनके बयान को लेकर यह चर्चा स्वाभाविक है कि क्या किसी परिवार के राजनीतिक समर्थन का उल्लेख किए बिना भी उसके साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठाई जा सकती?
लोकतंत्र में वोट सरकार चुनने का अधिकार है, अपने घर की सुरक्षा की शर्त नहीं।
आज सवाल यही है - क्या किसी नागरिक के घर और अधिकारों का मूल्यांकन उसकी वोटिंग पसंद से किया जाना चाहिए? या फिर कानून और इंसानियत का पैमाना हर नागरिक के लिए एक जैसा होना चाहिए?