Edited By meena, Updated: 03 Apr, 2026 04:10 PM

खगोल शास्त्र और विज्ञान की दृष्टि से 3 अप्रैल का दिन न केवल मध्यप्रदेश, बल्कि देश के लिए भी खास रहा। देश के विद्वानों और वैज्ञानिकों ने शुक्रवार को खगोल शास्त्र के साथ-साथ विज्ञान और वेद पर खुलकर बात की...
भोपाल/उज्जैन : खगोल शास्त्र और विज्ञान की दृष्टि से 3 अप्रैल का दिन न केवल मध्यप्रदेश, बल्कि देश के लिए भी खास रहा। देश के विद्वानों और वैज्ञानिकों ने शुक्रवार को खगोल शास्त्र के साथ-साथ विज्ञान और वेद पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि विकास, विज्ञान के साथ-साथ अध्यात्म आधारित होना चाहिए तभी हम सही विकास कर सकते हैं। इसके लिए हमारे वैदिक ज्ञान का आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वय कराना जरूरी है। उन्होंने आधुनिक विज्ञान के साथ बड़ी से बड़ी संख्या में युवाओं को जोड़ने की भी बात कही। इतना ही नहीं, सम्मेलन में एक तरफ उज्जैन को काल गणना नगरी बनाने की बात कही गई, तो दूसरी ओर ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) को महाकाल स्टैंडर्ड टाइम (MST) बनाने पर फोकस किया गया। मौका था उज्जैन के तारामंडल परिसर में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 'महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम' का। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस कार्यक्रम का शुभारंभ किया। उनके साथ केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और विचारक, चिंतक सुरेश सोनी भी मौजूद थे। इस मौके पर सभी ने महाकाल मास्टर ऑफ टाइम एग्जीबिशन का अवलोकन भी किया। कार्यक्रम में उज्जैन सिंहस्थ-2028 के लिए 19.80 किलोमीटर लंबे 701.86 करोड़ रुपये की लागत के 4 लेन बायपास और 22.52 करोड़ रुपये की सम्राट विक्रमादित्य द हेरिटेज इकाई की विस्तार परियोजना का भूमिपूजन हुआ। केंदीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने विद्यार्थी विज्ञान मंथन 2026-27 की वेबसाइट का भी शुभारंभ किया। इस मौके पर राष्ट्रीय विद्यार्थी विज्ञान मंथन की पुस्तकों का विमोचन भी हुआ।
कार्य्रकम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि उज्जैन धर्म की नगरी होने के साथ-साथ विज्ञान की भी नगरी है। महाकाल की इस नगरी की माटी में विज्ञान-गणित-खगोल-ब्रह्मांड का चिंतन सदियों से विद्यमान है। उज्जैन काल गणना का केंद्र रहा। यहां प्राचीन काल में सूर्य की छाया से समय नापने की कला विकसित हुई। प्राचीन भारतीय भूगोल के अनुसार उज्जैन कर्क रेखा पर स्थित है और इसे पृथ्वी का मध्य बिंदु माना जाता था। ग्रीनविच के वैश्विक मानक के अस्तित्व में आने से सदियों पहले शून्य देशांतर रेखा उज्जैन से होकर गुजरती थी। जब पश्चिम में खगोल शास्त्र का ज्ञान भी नहीं था, तब उज्जैन के ज्योतिष और विद्वान काल गणना के आधार पर नक्षत्र की स्थिति बता रहे थे। जब दुनिया समय को परिभाषित करना सीख रही थी, तब यहां महर्षियों ने खगोलीय गणनाओं का वैश्विक मानक स्थापित किया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि विज्ञान के अनुसार ब्रह्मांड की हर वस्तु समय के अधीन है। लेकिन, शिव उस अनंत का प्रतीक हैं जहां से समय जन्म लेता है और जहां समय का अंत होता है। इसीलिए वे काल के अधिष्ठाता यानी मास्टर ऑफ टाइम हैं। विज्ञान मानता है कि समय और अंतरिक्ष एक दूसरे से अविभाज्य हैं। हमारे शास्त्रों में युगों पहले शिव को विश्व स्वरूप और महाकाल कहकर इसी वैज्ञानिक सत्य को प्रतिपादित किया था।
मील का पत्थर साबित होगा यह सम्मेलन
सीएम डॉ. यादव ने कहा कि उज्जैन में आयोजित यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मील का पत्थर होगा। भूमध्य रेखा और कर्क रेखा का कटाव या केंद्र बिंदु पहले उज्जैन में था, जो अब यहां से 32 किलोमीटर दूर डोंगला में शिफ्ट हो गया है। यहां 21 जून को सूर्य की छाया शून्य हो जाती है। ग्रीनविच के मीन टाइम में रात को 10 बजे तक सूर्य के दर्शन होते हैं। यह केंद्र बिंदु कैसे हो सकता है। आज समय और स्पेस दोनों को एक दूसरे से समेकित रूप ले समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यह हम सब के लिए गौरव का विषय है कि उज्जैन को साइंस सिटी के रूप में स्थापित किया जा रहा है। इसी उद्देश्य से आज 15 करोड़ रुपए से अधिक की लागत से विज्ञान केंद्र का उद्घाटन किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हमें केंद्र सरकार का भी सहयोग निरंतर प्राप्त हो रहा है। वास्तव में यह अपनी वैज्ञानिक विरासत को पुनर्जीवित करने का सशक्त प्रयास है। साइंस सिटी के उद्घाटन के साथ उज्जैन को विज्ञान की नगरी बनाया जा रहा है। उज्जैन को काल गणना का केंद्र बनाने के संकल्प के साथ राज्य सरकार आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि आने वाला सिंहस्थ 2028 हमारे लिए उज्जैन की गरिमा को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने का स्वर्णिम अवसर है। सिंहस्थ में लगभग 40 करोड़ श्रद्धालु आएंगे। वे महाकाल दर्शन का पुण्य प्राप्त करने के साथ-साथ काल गणना के इस केंद्र का वैज्ञानिक महत्व भी जानेंगे। उन्होंने कहा कि भव्य और दिव्य सिंहस्थ के आयोजन के लिए तैयारियां चल रही हैं। आज ही उज्जैन को करीब 20 किलोमीटर के नए बायपास रोड का भूमिपूजन हुआ है।

तानाशाही व्यवस्था ने जो छीना, उसे वापस पाना है
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि अगर हमारे धार्मिक स्थलों को अध्ययन के स्तर पर देखा जाए तो उज्जैन, काशी, कांची और पुरी धाम भारतीय ज्ञान परंपरा विज्ञान-कला-संस्कृति-साहित्य-आध्यात्म आधारित प्रयोगशालाएं हैं। विज्ञान अध्यात्म के बिना अधूरा है। महाकाल की नगरी उज्जैन हमारी संस्कृति का पवित्र स्थान है, जिसका विशेष सांस्कृतिक महत्व है। दुनिया के किसी भी अनुसंधान को देखा जाए तो उज्जैन के बिना काल की गणना अधूरी है। यहां पृथ्वी की मध्य रेखा और कर्क रेखा का केंद्र बिंदु उज्जैन या उसके आसपास ही है। पश्चिमी देशों के लिए टाइम सिर्फ गणना है, लेकिन भारतीय सभ्यता में समय और टाइम में अंतर है। समय एक भावना और अभिव्यक्ति है। पश्चिमी कैलेंडर में दिन 30 या 31 तक सीमित हैं। भारत में पल-पल की वैज्ञानिक व्याख्या है। उन्होंने कहा कि आज भारत स्पेस टेक्नोलॉजी में अग्रणी देश बनकर उभरा है। वैश्विक युद्ध नीति में अब हाथी, धोड़े और सेना की संख्या से नहीं ड्रोन की संख्या से शक्ति की पहचान की जा रही है। स्पेस अब कम्युनिकेशन का प्रमुख माध्यम बन गया है। सैनिक क्षमता की दक्षता का प्रमाण नभ मंडल बन चुका है। पश्चिमी देशों ने भारतीय ज्ञान परंपरा को बदनाम करने के लिए इसे बदला था। अब हमारी सरकार इसे पुन: स्थापित करने के लिए ज्ञान भारतम् योजना लेकर आ रही है। काल गणना हमारी खोज और विरासत है। तानाशाही व्यवस्था ने जीएसटी के नाम पर हमसे छीन लिया था। ग्रीनविच स्टैंडर्ड टाइम यूरोप को बनाया गया, जबकि उसका मूल केंद्र उज्जैन, अवंतिका और डोंगला है। हमें महाकाल- मास्टर ऑफ टाइम तक सीमित नहीं रखना है। इसे महाकाल स्टैंडर्ड टाइम (MST) तक लेकर जाना है।
आज का संडे-मंडे हमारे ऋषियों के आविष्कार का दोहरीकरण
कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध लेखक-विचारक सुरेश सोनी ने कहा कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रयासों से युवाओं को भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ने में तीव्र गति मिली है। इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का ऐतिहासिक महत्व है। एक समय था, जब काल की गणना उज्जैन से होती थी। यहां काल के प्रतीक महाकाल परिसर में कर्कराजेश्वर मंदिर है। प्रसिद्ध पुरातत्वविद सर वीएस वाकणकर ने इसकी खोज की थी कि कर्क रेखा कालांतर में स्थान बदल रही है। उन्होंने कहा कि अब आधुनिक तकनीक जीपीएस से भी यह सिद्ध हो गया है कि कर्क रेखा का केंद्र बिंदू उज्जैन के पास डोंगला में शिफ्ट हो गया है। इस सम्मेलन का उद्देश्य उज्जैन को वैश्विक काल गणना का केंद्र बनाना है। इस सम्मेलन में दार्शनिक अवधारणाओं से लेकर वर्तमान में वैज्ञानिक प्रगति तक को समेटा गया है। समय के मापन में उज्जैन का विशेष महत्व है। भारतीय ऋषियों और खगोल शास्त्रियों ने गृहों का नामकरण किया। उसी को दुनिया संडे-मंडे के आधार पर दोहरा रही है। वर्तमान तकनीक का समाज और देश के हित में कैसे उपयोग हो, इसका बोध दृष्टि के साथ उपयोग करने की आवश्यकता है। जीवंत समाज में विज्ञान के साथ कला का सौंदर्य होना चाहिए। विज्ञान का विकास मनुष्य को शक्ति देगा, लेकिन इसके इस्तेमाल की बुद्धि अध्यात्म देगा। आज वैश्विक स्तर पर युद्ध हो रहा है। भारत में भी कभी धर्म युद्ध हुए हैं, जो नीति के अनुसार लड़े जाते थे। विज्ञान के साथ समाज का विकास भी जरूरी है। हम मंगल ग्रह पर पहुंच गए हैं, लेकिन किसान का हल वहीं है। हमें सबसे विकास के लिए प्रयास करने हैं। यह सम्मेलन संस्थाओं के अथक प्रयासों का परिणाम है। मैं इसके लिए सभी को साधुवाद देता हूं।

आज वैदिक ज्ञान का आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वय जरूरी
नीति आयोग के सदस्य पद्मश्री वीके सारस्वत ने कहा कि एस्ट्रोनॉमी के अनुसार जीरो मैरिडियन उज्जैन से गुजरती थी। हमारे पूर्वजों ने इसे किताबों में पढ़ा है। आजादी के बाद हमारी किताबें बदल गईं और वैदिक खगोल शास्त्र इनमें कहीं नहीं मिलता है। किताबों में पूरा ज्ञान पश्चिमी सोच पर आधारित था। आज हमें वैदिक ज्ञान का आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वय स्थापित करना है। हमें वैदिक और पारंपरिक ज्ञान के आविष्कार को दुनिया को बताना है। वर्तमान समय में विज्ञान में बहुत सी ऐसी बातें हैं, जिन्हें कोई समझा नहीं पाता। लेकिन, हमारे वैदिक ज्ञान में इनका विस्तार से वर्णन मिलता है। आधुनिक विज्ञान को इस रूप में लाना है कि वह समाज के लिए उपयोगी बने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकसित भारत-2047 का लक्ष्य रखा है। हमें युवाओं को साथ लेकर वैज्ञानिक सोच के साथ समस्याओं का हल निकालना है और आगे बढ़ना है। होर्मुज बंद होने से वर्तमान समय में भारत सहित कई देशों में ऊर्जा संकट देखा जा रहा है। हमें इकॉनोमिक ग्रोथ को विज्ञान के साथ जोड़ना है। लेकिन, यह ग्रोथ समावेशी होनी चाहिए। भारत को 30 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने के लिए आत्मनिर्भरता जरूरी है। आजकल आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस का दौर चल रहा है। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि भी लोगों के माथे की रेखाएं रेखकर बता देते थे कि किसी के मन में क्या चल रहा है। इसी का स्वरूप एआई है।
जीवंत हो रही भारतीय वैज्ञानिक परंपरा
इंडियन नॉलेज सिस्टम के राष्ट्रीय समन्वयक डॉ. एस. घंटी मूर्ति ने कहा कि यह आयोजन के माध्यम से भारतीय वैज्ञानिक परंपरा को जीवंत बनाया जा रहा है। प्राचीन वैदिक काल से वर्तमान समय में अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों को युवा पीढ़ी तक पहुंचाना है। संस्था की गतिविधियों में स्कूली बच्चों ने वैज्ञानिक मॉडल्स तैयार किए हैं। नवाचारों के लिए हमने वैदिक काल गणना के साथ नए काल गणना को एक साथ रखा है। इस सम्मेलन में स्पेस, ड्रोन, राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी सत्र होंगे। एस्ट्रोनॉमी और एसट्रोफिजिक्स पर भी विशेषज्ञ अपने विचार रखेंगे। हमें ज्ञान परंपरा को आगे लेकर जाना है। एमपीसीएसटी के महानिदेशक अनिल कोठारी ने कहा कि यहां तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘महाकाल: द मास्टर ऑफ टाइम’ के आयोजन में देशभर के 1000 से अधिक विद्यार्थी भी शामिल हुए हैं। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य उज्जैन को काल गणना का प्रमुख केंद्र बनाना है। कार्यक्रम में अनेक वरिष्ठ वैज्ञानिक, खगोलशास्त्री, ज्योतिषि, शिक्षाविद एवं बड़ी संख्या में शोधार्थी-विद्यार्थी उपस्थित थे।