Edited By Himansh sharma, Updated: 19 Sep, 2026 12:46 PM

नसबंदी ऑपरेशन के बाद गर्भधारण और फिर बच्चे के जन्म से जुड़े एक मामले में ग्वालियर हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
ग्वालियर। नसबंदी ऑपरेशन के बाद गर्भधारण और फिर बच्चे के जन्म से जुड़े एक मामले में ग्वालियर हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने मुआवजे की मांग को लेकर दायर महिला की प्रथम अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा। सुनवाई के दौरान मेडिकल रिकॉर्ड और सोनोग्राफी रिपोर्ट के आधार पर सामने आया कि महिला नसबंदी कराने से पहले ही गर्भवती हो चुकी थी। ऐसे में अदालत ने डॉक्टरों को चिकित्सकीय लापरवाही के लिए जिम्मेदार नहीं माना।
मामला शिवपुरी जिला अस्पताल से जुड़ा है। महिला लेडी किश्वर के पहले से पांच बच्चे थे। परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उसने 17 मार्च 2004 को जिला अस्पताल में नसबंदी ऑपरेशन कराया था। ऑपरेशन के कुछ समय बाद पेट में दर्द की शिकायत होने पर उसकी जांच कराई गई। सोनोग्राफी में गर्भावस्था की पुष्टि हुई। इसके बाद महिला ने 25 अक्टूबर 2004 को एक बेटी को जन्म दिया, जो उसकी छठी संतान थी।
1.5 लाख रुपये मुआवजे की थी मांग
बच्चे के जन्म के बाद महिला ने चिकित्सकीय लापरवाही का आरोप लगाते हुए डॉक्टरों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की और 1.5 लाख रुपये मुआवजे की मांग की। मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट, शिवपुरी में हुई, लेकिन 20 मार्च 2006 को अदालत ने उसका दावा खारिज कर दिया।
ट्रायल कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट महिला ने इसके खिलाफ ग्वालियर हाईकोर्ट में प्रथम अपील दाखिल की। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने मामले से जुड़े मेडिकल दस्तावेजों, जांच रिपोर्ट और डॉक्टरों के बयानों का विस्तार से परीक्षण किया।
सोनोग्राफी रिपोर्ट से सामने आई गर्भावस्था की टाइमलाइन
सुनवाई के दौरान सामने आया कि 4 जुलाई 2004 को कराई गई सोनोग्राफी के समय महिला लगभग 22 सप्ताह की गर्भवती थी। गर्भावस्था की अवधि के आधार पर जब पीछे की तारीखों की गणना की गई तो गर्भधारण की संभावित अवधि 17 मार्च 2004 से पहले की निकली। इसका मतलब यह हुआ कि जिस दिन महिला ने नसबंदी ऑपरेशन कराया, उस समय वह पहले से गर्भवती थी। हालांकि गर्भावस्था शुरुआती चरण में होने के कारण उपलब्ध जांच में उसका पता नहीं चल पाया था।
जांच के आधार पर ही किया गया था ऑपरेशन
हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि नसबंदी प्रक्रिया से पहले महिला के आवश्यक पैथोलॉजिकल टेस्ट कराए गए थे। उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसी कोई ठोस सामग्री नहीं मिली, जिससे यह साबित हो कि डॉक्टरों को महिला की गर्भावस्था की जानकारी थी और इसके बावजूद उन्होंने जानबूझकर नसबंदी की।
अदालत ने माना कि केवल नसबंदी के बाद बच्चे का जन्म हो जाना अपने आप में डॉक्टरों की चिकित्सकीय लापरवाही साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। लापरवाही स्थापित करने के लिए यह दिखाना जरूरी होता है कि डॉक्टरों ने उपचार या ऑपरेशन की प्रक्रिया में अपेक्षित चिकित्सकीय सावधानी नहीं बरती। मामले में ऐसी गंभीर लापरवाही साबित नहीं होने पर हाईकोर्ट ने महिला की प्रथम अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें मुआवजे का दावा अस्वीकार किया गया था।