Edited By meena, Updated: 08 Apr, 2026 08:38 PM

रुबीना इकबाल खान ने कहा कि वे जन गण मन सहित अन्य देशभक्ति गीत गाती हैं, लेकिन ‘वंदे मातरम’ के एक शब्द को बोलने से परहेज करती हैं। उनके मुताबिक, “वंदे” का अर्थ इबादत होता है और इस्लाम में सिर्फ अल्लाह की इबादत की जाती है, इसलिए वे इसे नहीं कहतीं...
इंदौर (सचिन बहरानी) : इंदौर में ‘वंदे मातरम’ को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस की पार्षद रुबीना इकबाल खान के बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है, जिसमें उन्होंने ‘वंदे मातरम’ कहने से इनकार करने की बात कही। रुबीना इकबाल खान ने कहा कि वे जन गण मन सहित अन्य देशभक्ति गीत गाती हैं, लेकिन ‘वंदे मातरम’ के एक शब्द को बोलने से परहेज करती हैं। उनके मुताबिक, “वंदे” का अर्थ इबादत होता है और इस्लाम में सिर्फ अल्लाह की इबादत की जाती है, इसलिए वे इसे नहीं कहतीं।
उन्होंने आजादी के दौर का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय ‘वंदे मातरम’ के नारे लगाने वाले लोग शायद धार्मिक पहलुओं को नहीं समझते थे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस देश की मिट्टी पर उनका और उनके समुदाय का उतना ही नहीं, बल्कि अधिक हक है, क्योंकि उन्हें इसी मिट्टी में दफनाया जाता है। खोदोंगे तो हमारे अवशेष यही मिलेंगे लेकिन हिंदुओं के तो गंगा नदी में बहा दिए जाते हैं जो सीधे जाकर अरब सागर में मिलते हैं।
राजनीतिक बयानबाजी के बीच उन्होंने कांग्रेस पर भी निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी उनका साथ नहीं देती। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे निर्दलीय चुनाव जीतती हैं और कांग्रेस से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
इस बयान के सामने आने के बाद इंदौर में सियासी माहौल गरमा गया है। अलग-अलग राजनीतिक दल और सामाजिक संगठनों की ओर से इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, और आने वाले समय में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है।
बजट पर चर्चा के दौरान हुआ था हंगामा
इससे पहले बजट पर चर्चा के दौरान जब ‘वंदे मातरम’ बोला जा रहा था, तब पार्षद फौजिया अलीम ने इसमें शामिल होने से मना कर दिया। उनके इस रुख पर सभापति ने नाराजगी जताई और उन्हें सदन से बाहर जाने के निर्देश दे दिए।
बाद में मीडिया से बातचीत में फौजिया अलीम ने कहा कि “हम भारत माता की पूजा नहीं करते। किसी पर ‘वंदे मातरम’ या ‘जय श्रीराम’ बोलने का दबाव बनाना गलत है। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान के तहत किसी भी व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार धर्म मानने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, और ‘वंदे मातरम’ गाना अनिवार्य नहीं है।