Edited By Himansh sharma, Updated: 04 Aug, 2026 06:45 PM
भोपाल/दतिया। दतिया विधानसभा उपचुनाव का परिणाम केवल एक सीट की हार-जीत तक सीमित नहीं रहा। इस चुनाव ने मध्य प्रदेश की सियासत में कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में यह भारतीय जनता पार्टी की पहली बड़ी चुनावी परीक्षा थी, जिसमें पार्टी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी। वहीं कांग्रेस ने आंतरिक विवादों के बावजूद जीत दर्ज कर यह संदेश दिया कि स्थानीय राजनीतिक समीकरण कई बार संगठनात्मक ताकत पर भी भारी पड़ जाते हैं। कांग्रेस प्रत्याशी कुंवर घनश्याम सिंह ने भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से पराजित किया। यह वही सीट है जो पूर्व कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद खाली हुई थी। चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में कांग्रेस के भीतर मतभेद खुलकर सामने आए और राजेंद्र भारती को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित तक करना पड़ा। इसके बावजूद कांग्रेस अपने वोट बैंक को एकजुट रखने में सफल रही।
क्या टिकट बदलने का फैसला पड़ा भारी?
चुनाव का सबसे चर्चित पहलू भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना रहा। करीब तीन दशक तक दतिया की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे मिश्रा की जगह पार्टी ने पहली बार चुनाव लड़ रहे आशुतोष तिवारी पर भरोसा जताया।
टिकट बदलने के बाद स्थानीय स्तर पर असंतोष खुलकर सामने आया। कई कार्यकर्ताओं ने नाराज़गी जताई, कुछ पदाधिकारियों ने इस्तीफे दिए और चुनाव प्रचार के दौरान नरोत्तम मिश्रा का भावुक होना भी लगातार चर्चा में रहा। हालांकि बाद में उन्होंने पार्टी के पक्ष में प्रचार किया और कार्यकर्ताओं से एकजुट रहने की अपील भी की, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठन पहले जैसी मजबूती से सक्रिय नहीं दिखा।
सिर्फ़ नरोत्तम फैक्टर नहीं, कई वजहों ने बनाया माहौल
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा की हार को केवल नरोत्तम मिश्रा फैक्टर से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं होगी। चुनाव के दौरान स्थानीय स्तर पर गुटबाजी, कार्यकर्ताओं की नाराज़गी, प्रत्याशी का सीमित जनसंपर्क अनुभव और कांग्रेस द्वारा स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाना भी महत्वपूर्ण कारण रहे।
मतगणना के शुरुआती दौर में मुकाबला बराबरी का रहा, लेकिन तीसरे राउंड के बाद कांग्रेस ने लगातार बढ़त बनाई। एक समय जीत का अंतर 12 हजार वोटों से अधिक पहुंच गया। अंतिम चरणों में भाजपा ने अंतर कम किया, लेकिन तब तक कांग्रेस निर्णायक बढ़त हासिल कर चुकी थी।
मोहन सरकार के लिए राजनीतिक संकेत
यह उपचुनाव सरकार बदलने वाला नहीं था और विधानसभा में भाजपा के बहुमत पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसके बावजूद पार्टी ने इसे प्रतिष्ठा का चुनाव माना। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, कई मंत्री और संगठन के वरिष्ठ नेता प्रचार में उतरे। दूसरी ओर कांग्रेस ने भाजपा की अंदरूनी खींचतान और स्थानीय असंतोष को चुनावी मुद्दा बनाकर लाभ उठाया।
भाजपा के सामने अब सबसे बड़ा सवाल
दतिया विधानसभा सीट पर भाजपा को लगातार दूसरी बार हार मिली है। 2023 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने इसी सीट पर जीत दर्ज की थी और अब उपचुनाव में भी भाजपा वापसी नहीं कर सकी। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह हार केवल उम्मीदवार बदलने का परिणाम है, या फिर संगठन के भीतर मौजूद असंतोष और स्थानीय समीकरणों ने मिलकर चुनाव का रुख बदल दिया?
आने वाले दिनों में भाजपा की समीक्षा बैठकों और संगठनात्मक फैसलों से यह साफ होगा कि पार्टी इस हार से क्या सबक लेती है। वहीं कांग्रेस के लिए यह जीत मनोबल बढ़ाने वाली साबित हुई है, क्योंकि उसने आंतरिक विवादों के बावजूद भाजपा के मजबूत गढ़ में लगातार दूसरी बार विजय हासिल की है।