Edited By Desh Raj, Updated: 03 Jul, 2026 10:27 PM

दतिया विधानसभा में उपचुनाव की घोषणा के साथ ही मध्यप्रदेश में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। एक बार फिर राजनीति का केंद्र बुंदेलखंड बन गया है। खास बात यह है कि यह चुनाव सिर्फ एक सीट जीतने और हारने का उपचुनाव नहीं, बल्कि भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए...
(डेस्क): दतिया विधानसभा में उपचुनाव की घोषणा के साथ ही मध्यप्रदेश में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। एक बार फिर राजनीति का केंद्र बुंदेलखंड बन गया है। खास बात यह है कि यह चुनाव सिर्फ एक सीट जीतने और हारने का उपचुनाव नहीं, बल्कि भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है।
भाजपा के लिए यह चुनाव इसलिए खास है क्योंकि यहां से पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का फिर से लौटने के आसार है। वहीं कांग्रेस के सामने जीती हुई सीट बचाने के साथ संगठन की एकजुटता साबित करने की चुनौती है ।
वैसे दतिया सीट नरोत्तम मिश्रा का अभेद्य गढ़ मानी जाती रही है लेकिन साल 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने उन्हें हराकर सबको चौंका दिया था और प्रदेश के गृहमंत्री के जीवन की सबसे दुखद हार दी थी। इस हार के साथ ही नरोत्तम मिश्रा सत्ता के साथ ही विधानसभा से बाहर हो गए थे ।अब यदि भाजपा दतिया सीट वापस जीतती है तो नरोत्तम मिश्रा की पुरानी छवि फिर लौट सकती है। यही से जीत हार पर उनके राजनीतिक भविष्य का भी निर्धारण हो सकता है।
वैसे भाजपा की ओर से नरोत्तम मिश्रा का चुनाव लडऩा लगभग तय माना जा रहा है। वहीं कांग्रेस में टिकट के लिए तीन प्रमुख नाम चर्चा में हैं। सेंवढ़ा के पूर्व विधायक घनश्याम सिंह, पूर्व विधायक राजेंद्र भारती, जो अपने पुत्र को टिकट दिलाने का प्रयास कर रहे हैं और भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए पाठ्यपुस्तक निगम के पूर्व उपाध्यक्ष अवधेश नायक। वैसे आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव ने भी अपना दावा ठोकते हुए ऐलान कर दिया है।
कांग्रेस के लिए सीट के साथ ही संगठन की भी परीक्षा
यहां कांग्रेस के सामने चुनौती सिर्फ सीट बचाने की नहीं है, बल्कि गुटबाजी और वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेदों में को भूलाकर एकजुटता दिखाने की है। दतिया उपचुनाव प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व की भी परीक्षा मानी जा रही है।
बुंदेलखंड की राजनीति पर भी असर
दतिया उपचुनाव का असर काफी कुछ तय करेगा। यहां का नतीजा बुंदेलखंड में भाजपा और कांग्रेस की राजनीतिक पकड़ को भी निर्धारित करेगा। इसका नतीजा नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक प्रासंगिकता, मोहन यादव के नेतृत्व में संगठन क्षमता और कांग्रेस के लिए जीतू पटवारी की नेतृत्व योग्यता का भी निर्धाऱण करेगा।