Edited By Himansh sharma, Updated: 27 May, 2026 04:46 PM

राजनीति में अक्सर शक्ति, रणनीति और पद की चर्चा होती है, लेकिन कुछ पल ऐसे भी आते हैं जब नेतृत्व का असली चेहरा फैसलों से नहीं, संवाद से दिखाई देता है।
भोपाल: राजनीति में अक्सर शक्ति, रणनीति और पद की चर्चा होती है, लेकिन कुछ पल ऐसे भी आते हैं जब नेतृत्व का असली चेहरा फैसलों से नहीं, संवाद से दिखाई देता है। मध्यप्रदेश की राजनीति में 2023 विधानसभा चुनाव से पहले ऐसा ही एक दौर आया था, जब यह चर्चा तेज हो गई थी कि शिवराज सिंह चौहान का राजनीतिक दौर समाप्ति की ओर है। विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा था, पार्टी की पहली सूची में नाम न होने से अटकलें और बढ़ गईं।
ऐसे समय में, जब सामान्यतः नेता जवाबी राजनीति में उतरते हैं, तब एक अलग संवाद सामने आया।
अपनी पुस्तक ‘अपनापन : नरेंद्र मोदी संग मेरे अनुभव’ में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उस दौर का जिक्र किया है। उनके अनुसार, माहौल और चर्चाओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फोन आया। लेकिन वह बातचीत राजनीति से ज्यादा मन और धैर्य की थी।
शिवराज के मुताबिक, पीएम ने कहा - मैं मुख्यमंत्री से नहीं, अपने शिवराज से बात कर रहा हूं… इतनी चिंता क्यों कर रहे हो? कुछ दिन एकांत में जाओ, अपने भीतर झांको।”
यह सलाह राजनीतिक नहीं, बल्कि आत्ममंथन की थी।
शिवराज बताते हैं कि इसके बाद वे उत्तराखंड गए, गंगा किनारे समय बिताया और खुद को शांत किया। लौटने के बाद उन्होंने पूरे प्रदेश में चुनाव प्रचार किया और बीजेपी ने रिकॉर्ड जीत दर्ज की।
किताब में केवल इस घटना का नहीं, बल्कि मोदी और शिवराज के लंबे राजनीतिक सफर के कई ऐसे प्रसंगों का उल्लेख है, जो संगठन, तकनीक और व्यक्तिगत संबंधों की झलक देते हैं। शिवराज ने उस दौर को भी याद किया जब नरेंद्र मोदी मध्यप्रदेश के प्रभारी थे और कार्यकर्ताओं से ईमेल आईडी पूछकर आने वाले भारत की दिशा समझा रहे थे - उस समय जब तकनीक राजनीति की मुख्य धारा नहीं बनी थी।साथ ही, निजी जीवन के कठिन क्षणों— पिता के निधन और कोविड संक्रमण - में भी प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत संवाद का उल्लेख पुस्तक में किया गया है।
यह कहानी केवल दो नेताओं की नहीं, बल्कि उस संदेश की भी है कि राजनीति में कभी-कभी सबसे बड़ा उत्तर शोर नहीं, बल्कि कुछ समय का मौन और आत्मविश्वास होता है