पूरे MP में बंट गए सत्ता के पद, लेकिन यह जिला रह गया खाली! BJP की अंदरूनी राजनीति आई सामने

Edited By Himansh sharma, Updated: 07 Aug, 2026 06:24 PM

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मध्य प्रदेश की राजनीति में इंदौर को भारतीय जनता पार्टी का सबसे मजबूत और प्रभावशाली गढ़ माना जाता है।

इंदौर: मध्य प्रदेश की राजनीति में इंदौर को भारतीय जनता पार्टी का सबसे मजबूत और प्रभावशाली गढ़ माना जाता है। लंबे समय से यह शहर संगठनात्मक नवाचारों और राजनीतिक रणनीतियों की प्रयोगशाला के रूप में पहचान रखता आया है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में यही इंदौर भाजपा के भीतर चल रही खींचतान और गुटीय समीकरणों का सबसे बड़ा प्रभावित क्षेत्र बनकर उभरा है। स्थिति यह है कि प्रदेशभर में राजनीतिक नियुक्तियों का सिलसिला आगे बढ़ चुका है, जबकि इंदौर अब भी प्रतीक्षा सूची में खड़ा दिखाई दे रहा है।

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि विभिन्न निगमों, मंडलों, प्राधिकरणों और अन्य सरकारी संस्थाओं में नियुक्तियां होने के बावजूद इंदौर के किसी भी प्रमुख नेता को अब तक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं मिली है। इतना ही नहीं, नगर निगम में एल्डरमैन की नियुक्ति सहित कई स्थानीय स्तर के निर्णय भी लंबित हैं, जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है।

इंदौर भाजपा की सबसे बड़ी पहचान यह रही है कि यहां विकसित हुए कई संगठनात्मक मॉडल बाद में पूरे प्रदेश और देश में लागू किए गए। शक्ति केंद्र की अवधारणा हो या युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति, इंदौर हमेशा संगठन के लिए दिशा तय करने वाला शहर रहा है। लेकिन वर्तमान दौर में यही शहर संगठनात्मक प्राथमिकताओं से बाहर नजर आने लगा है।

संगठन के मोर्चों और प्रकोष्ठों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग मोर्चा को छोड़ दें तो युवा मोर्चा, महिला मोर्चा और कई अन्य महत्वपूर्ण इकाइयों में अब तक नेतृत्व घोषित नहीं किया गया है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में पैनल तैयार होने के बावजूद अंतिम निर्णय लंबित है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विभिन्न गुटों के बीच सहमति नहीं बनने से नियुक्तियों की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।

सूत्रों के अनुसार, प्रदेश स्तर पर भी अलग-अलग नेताओं की पसंद और स्थानीय समीकरण इस देरी की बड़ी वजह माने जा रहे हैं। इसी कारण किसान मोर्चा सहित कई अन्य संगठनात्मक इकाइयों में भी नियुक्तियां अटकी हुई हैं। इसका असर सीधे तौर पर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ रहा है, क्योंकि लंबे समय से सक्रिय कार्यकर्ता जिम्मेदारियों और अवसरों का इंतजार कर रहे हैं।

यदि वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो सरकार से जुड़े महत्वपूर्ण राजनीतिक पदों पर इंदौर के केवल दो नेताओं की मौजूदगी दिखाई देती है। इससे यह संदेश भी जा रहा है कि प्रदेश के सबसे बड़े संगठनात्मक केंद्र को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि जल्द ही नियुक्तियों और संगठनात्मक विस्तार पर निर्णय नहीं हुआ तो कार्यकर्ताओं की नाराजगी भविष्य में संगठन के लिए चुनौती बन सकती है।

फिलहाल भाजपा के भीतर सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस इंदौर ने वर्षों तक संगठन को नई दिशा दी, क्या वही शहर अब अंदरूनी गुटबाजी और राजनीतिक संतुलन की राजनीति में अपनी अहमियत खोता जा रहा है, या फिर आने वाले दिनों में नेतृत्व इस असंतुलन को दूर करने के लिए कोई बड़ा फैसला करेगा।

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