किसानों का गुस्सा उफान पर: चार हाईवे थमे, बैलगाड़ियां बनीं प्रतिरोध का प्रतीक, बोले- सरकार ने भरोसे का भी मज़ाक उड़ा दिया!

Edited By meena, Updated: 01 Nov, 2025 06:35 PM

farmers  anger boils over four highways blocked bullock carts become a symbol

कभी अन्नदाता कहे जाने वाले किसान अब प्रशासन के दरवाज़ों पर गिड़गिड़ाने को मजबूर हैं। राहत के नाम पर सिर्फ वादे...

खंडवा (मुश्ताक मंसूरी) : कभी अन्नदाता कहे जाने वाले किसान अब प्रशासन के दरवाज़ों पर गिड़गिड़ाने को मजबूर हैं। राहत के नाम पर सिर्फ वादे, और मैदान में सिर्फ निराशा। शनिवार को जब देवउठनी ग्यारस के दिन पूरा प्रदेश उत्सव मना रहा था, तब खंडवा के किसान सड़कों पर अपनी बदहाली की कहानी लेकर उतर आए। संयुक्त कृषक संगठन के बैनर तले जिले के चारों दिशाओं में सैकड़ों किसानों ने फोरलेन और हाईवे रोक दिए। बैलगाड़ियां अड़ाईं, गन्ने के मंडप बनाए और सरकार को जगाने का प्रतीकात्मक संदेश दिया “अब बस, बहुत हो गया!”

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चार हाईवे, चार मोर्चे- हर जगह फूटा किसानों का गुस्सा

आशापुर में हरसूद तहसील अध्यक्ष महेश यादव की अगुवाई में किसानों ने घंटों तक जाम लगाया। खालवा क्षेत्र में राहुल खोरे ने मोर्चा संभाला, तो जावर-मुंदी हाईवे पर खंडवा तहसील अध्यक्ष रविंद्र पाटीदार, जिला सह मंत्री शशि कुमार मिश्रा और तहसील मंत्री चंदन सिंह चंदेल सड़क पर डटे रहे।

वहीं सिंगोट हाईवे पर मुकेश गुर्जर, देवराम यादव, और छैगांव माखन नेशनल हाईवे पर भोजाखेड़ी के पास नरेंद्र पटेल, आशीष बरोल, जय पटेल, राजेंद्र प्रजापति, और श्रवण पटेल के नेतृत्व में किसान उग्र प्रदर्शन पर उतर आए। हर चौराहे पर नारे गूंजे  “फसल हमारी, दर्द हमारा, पर राहत किसी और को!” “बीमा कंपनी अमीर, किसान फिर गरीब!”

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“कागज़ों में राहत, खेतों में बर्बादी” किसानों की हकीकत

किसानों ने बताया कि सोयाबीन की फसल बर्बाद हो गई, प्याज सड़ चुकी है, मक्का की खरीदी ठप है। फिर भी प्रशासन कागज़ों में राहत दिखा रहा है। संयुक्त कृषक संगठन के नेताओं ने कहा कि पौने दो लाख किसान प्रभावित हैं, पर सरकार ने अब तक सिर्फ 16 हजार किसानों के खाते में मामूली पाँच-पाँच हजार रुपये डाले हैं। “क्या इतने पैसों से किसान बीज खरीदेगा या बच्चों का पेट भरेगा?” — किसान नेताओं ने सवाल उठाया।

“प्रशासन बहानेबाज़ी में माहिर, भुगतान में नाकाम”

किसान संगठनों ने प्रशासन पर तीखा आरोप लगाते हुए कहा कि शासन-प्रशासन किसान को छलने का नया तरीका निकाल चुका है- रोज 100–150 किसानों को राशि देकर दिखावा किया जा रहा है। राजेंद्र प्रजापति ने कहा, “अगर पूरी लिस्ट तैयार है तो एकमुश्त भुगतान क्यों नहीं करते? यह राहत नहीं, किसान के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा व्यवहार है।”

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किसानों की मांगें- सीधे, सटीक और स्पष्ट

सोयाबीन फसल की राहत राशि तुरंत दी जाए
बारिश और कीट प्रकोप से खराब प्याज फसल का सर्वे दोबारा हो
प्याज किसानों को 20 प्रति किलो बोनस दिया जाए
मक्का फसल की खरीदी समर्थन मूल्य पर तुरंत शुरू हो
फसल बीमा क्लेम का भुगतान बिना देरी के खातों में हो
किसानों को एकमुश्त राहत दी जाए, टुकड़ों में नहीं

“देवउठनी पर सरकार को जगाया” गन्ने के मंडप बने प्रतीक

देवउठनी ग्यारस के दिन किसानों ने सड़क किनारे गन्ने की झोपड़ियां बनाईं। भगवान के जागरण के साथ उन्होंने सरकार को जगाने की कोशिश की। बुज़ुर्ग किसानों ने कहा, “हर साल वादे सुनते हैं- राहत, बीमा, समर्थन मूल्य, लेकिन हक़ के नाम पर सिर्फ धोखा मिलता है। हम सरकार की झूठी योजनाओं में नहीं, न्याय में विश्वास करते हैं।”

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प्रशासन मौके पर, पर किसानों का भरोसा टूटा

अपर कलेक्टर काशीराम बड़ौले, एसडीएम ऋषि सिंघई, डीएसपी अनिल सिंह चौहान और तहसीलदार मौके पर पहुंचे, मगर किसानों ने साफ कहा कि “अब आश्वासन नहीं, कार्रवाई चाहिए।”अधिकारियों ने लिखित में सात दिन में राहत राशि वितरण की बात कही, पर किसानों ने चेतावनी दी “अगर सात दिन में खेतों तक पैसा नहीं पहुंचा, तो अगला आंदोलन संभाग नहीं, प्रदेश स्तर पर होगा।”

एक सन्नाटा जो बताता है दर्द

जिले के खेतों में आज न हरियाली है, न उम्मीद। किसान के माथे की लकीरें अब उसकी मजबूरी की कहानी बन चुकी हैं। गांवों में बीज खत्म हैं, बोरवेल सूखे हैं और बैंक की किश्तें सिर पर हैं। राहत राशि के नाम पर सरकार के वादे अब किसानों के लिए अपमान की तरह महसूस हो रहे हैं। “हम अपनी मिट्टी पर मर सकते हैं, पर झूठे आश्वासन पर नहीं जिएंगे।”  आंदोलनरत किसान

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