Edited By Himansh sharma, Updated: 02 Jan, 2026 01:58 PM
मध्यप्रदेश में बीते ढाई महीनों के भीतर हुई दो घटनाओं ने न सिर्फ प्रदेश, बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है।
भोपाल। मध्यप्रदेश में बीते ढाई महीनों के भीतर हुई दो घटनाओं ने न सिर्फ प्रदेश, बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। छिंदवाड़ा में कफ सिरप से 22 मासूम बच्चों की मौत और अब इंदौर में जहरीले, गंदे पानी से 14 लोगों की जान जाना—ये महज़ हादसे नहीं हैं। ये उस सिस्टम की नाकामी हैं, जो चेतावनियों को अनसुना करता है, शिकायतों को दबाता है और मौतों के बाद सिर्फ सस्पेंशन का तमाशा करता है।
स्वच्छ शहर पर बदनुमा दाग
इंदौर जिसे सरकारें देश का सबसे स्वच्छ शहर” बताकर गर्व करती रहींआज उसी शहर में लोगों को जहर मिला पानी पीना पड़ा। नतीजा यह कि सैकड़ों लोग बीमार पड़े और 14 परिवारों के घरों में मातम छा गया। यह सवाल लाजिमी है कि क्या स्वच्छता के तमगों की चमक में बुनियादी जिम्मेदारियां धुंधली हो गईं?
एक मासूम की मौत और सिस्टम की बेरुखी
पांच महीने का अव्यान जिसके जन्म के लिए मां ने दस साल इंतज़ार किया, नौ महीने बेड रेस्ट किया जहरीले पानी का शिकार हो गया। नल के पानी से दूध बनाया गया और बच्चे की तबीयत बिगड़ती चली गई। कैमरे के सामने मां की चीखें गूंजती रहीं, लेकिन करप्ट सिस्टम, नगर निगम, पार्षद और मंत्री किसी तक भी वो चीख नहीं पहुंची।
चेतावनियों के बावजूद सप्लाई जारी
यह त्रासदी अचानक नहीं घटी। 2022 में ही चेताया गया था कि ड्रेनेज में पानी की पाइपलाइन डालना खतरनाक हो सकता है। बावजूद इसके, नगर निगम और प्रशासन ने आंखें मूंदे रखीं। नतीजा आज सबके सामने है—ड्रेनेज से मिला जहरीला पानी, और मौतें।
1400 बीमार, फिर भी तंत्र बेखबर
भागीरथपुरा में लोग एक दिन में बीमार नहीं पड़े। करीब एक महीने से शिकायतें होती रहीं। लोग उल्टी-दस्त से जूझते रहे, आवेदन देते रहे—लेकिन कोई सुनवाई नहीं। जब एक साथ बड़ी संख्या में लोग अस्पताल पहुंचे और मौतें हुईं, तब जाकर मंत्री और अफसर हरकत में आए।
सत्ता किसकी, जिम्मेदारी किसकी?
जिस शहर में हादसा हुआ, वहां विधायक बीजेपी के हैं, सांसद बीजेपी के हैं, और पूरा शहर मुख्यमंत्री मोहन यादव की निगरानी में आता है। फिर इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हुई? क्या जिम्मेदारी तय होगी या फिर फाइलें बंद कर दी जाएंगी?
छिंदवाड़ा: 22 मासूम और वही पुरानी कहानी
इंदौर अकेला मामला नहीं। अक्टूबर में छिंदवाड़ा में जहरीले कफ सिरप ने 22 बच्चों की जान ले ली। सिरप बिकता रहा, बच्चे मरते रहे, और सिस्टम सोता रहा। बाद में कुछ गिरफ्तारियां हुईं—डॉक्टर, कंपनी मालिक लेकिन जिन अफसरों ने मंजूरी दी, जिनकी जेबें भरीं, उन पर कोई कार्रवाई नहीं।
कर्मचारी निलंबित, अफसर सुरक्षित
हर हादसे के बाद वही स्क्रिप्ट दो-चार कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया जाता है, असली अफसर बच निकलते हैं। ज्यादा से ज्यादा उनका तबादला कर दिया जाता है। इंदौर का बावड़ी हादसा हो या आज की यह त्रासदी—मौतों के बाद भी जिम्मेदारी तय नहीं होती।
विलाप बहुत हुआ, जवाब चाहिए
नेता गलियों में घूमकर संवेदना जता रहे हैं, लेकिन सवाल पूछने पर तिलमिला जाते हैं। भागीरथपुरा की गलियों में लोग आज भी निगम, पार्षद और प्रशासन की लापरवाही के किस्से सुना रहे हैं। बीमारों की संख्या बढ़ती जा रही है ,लेकिन क्या दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी?