मंत्री के जिले में ‘बेघर’ स्कूल: तीन साल से पंचायत भवन में चल रही पढ़ाई, बच्चों ने पूछा हमारा अपना स्कूल कब मिलेगा?

Edited By Vandana Khosla, Updated: 23 Jun, 2026 02:07 PM

homeless schools in the minister s district classes have been held in the

दुर्ग/धमधा (हेमंत पाल): एक ओर सरकार शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, स्मार्ट क्लास और आधुनिक सुविधाओं की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा मंत्री के गृह जिले दुर्ग में एक ऐसा गांव है, जहां बच्चे पिछले तीन वर्षों से अपने स्कूल भवन से बेदखल होकर पंचायत...

दुर्ग/धमधा (हेमंत पाल): एक ओर सरकार शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, स्मार्ट क्लास और आधुनिक सुविधाओं की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा मंत्री के गृह जिले दुर्ग में एक ऐसा गांव है, जहां बच्चे पिछले तीन वर्षों से अपने स्कूल भवन से बेदखल होकर पंचायत भवन में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। यह मामला धमधा ब्लॉक के साजा विधानसभा क्षेत्र स्थित ग्राम खैरझिटी का है, जहां जर्जर स्कूल भवन शिक्षा व्यवस्था की हकीकत बयां कर रहा है।

स्कूल है, लेकिन बच्चों के लिए नहीं
गांव में प्राथमिक शाला का भवन मौजूद है, लेकिन उसकी हालत इतनी खराब हो चुकी है कि वहां बच्चों को बैठाना खतरे से खाली नहीं माना जा रहा। छत और दीवारों से लगातार मलबा झड़ने की शिकायतें सामने आती रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि भवन कभी भी भरभराकर गिर सकता है, इसलिए बच्चों को वहां पढ़ाने का जोखिम नहीं लिया जा रहा। विडंबना यह है कि स्कूल का भवन तो गांव में खड़ा है, लेकिन शिक्षा पंचायत भवन में चल रही है। यानी स्कूल के नाम पर भवन है, पर बच्चों के लिए उपयोगी नहीं।

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पंचायत भवन बना अस्थायी स्कूल
जर्जर भवन के कारण पिछले तीन वर्षों से कक्षाएं पंचायत भवन में संचालित की जा रही हैं। लेकिन पंचायत भवन भी पढ़ाई के लिए उपयुक्त वातावरण नहीं दे पा रहा। यहां पंचायत बैठकों, सामाजिक कार्यक्रमों और अन्य गतिविधियों के चलते बच्चों की पढ़ाई बार-बार प्रभावित होती है। कई बार ऐसी स्थिति बनती है कि बैठक या कार्यक्रम होने पर बच्चों की कक्षाएं बाधित हो जाती हैं। ग्रामीणों का कहना है कि शिक्षा का केंद्र बनने की बजाय पंचायत भवन अब मजबूरी का विकल्प बनकर रह गया है।

बच्चों की मासूम शिकायत
बच्चों का कहना है कि पंचायत भवन में पढ़ाई के दौरान अक्सर शोर-शराबा रहता है। कभी लोग आते-जाते रहते हैं तो कभी बैठकें चलती रहती हैं। ऐसे माहौल में पढ़ाई पर ध्यान लगाना मुश्किल हो जाता है। एक छात्र ने कहा कि “हमारा भी मन करता है कि हम अपने स्कूल में पढ़ें, लेकिन वहां जाना सुरक्षित नहीं है।”

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तीन साल से सिर्फ आश्वासन
ग्रामीणों के अनुसार उन्होंने कई बार शिक्षा विभाग, जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों को समस्या से अवगत कराया। स्थानीय विधायक ईश्वर साहू सहित संबंधित विभागों तक भी मामला पहुंचाया गया, लेकिन अब तक न तो नए भवन की स्वीकृति मिली और न ही पुराने भवन की मरम्मत का कोई ठोस कार्य शुरू हो सका। ग्रामीणों का आरोप है कि हर बार केवल आश्वासन मिलता है, लेकिन जमीन पर कोई बदलाव दिखाई नहीं देता।

प्रतिभाओं का गांव, सुविधाओं से वंचित
खैरझिटी गांव की पहचान केवल इस समस्या से नहीं है। ग्रामीण बताते हैं कि यहां से हर वर्ष छात्र-छात्राएं जवाहर नवोदय विद्यालय जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में चयनित होते रहे हैं। यानी प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन बुनियादी सुविधाओं का अभाव इन बच्चों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।

सबसे बड़ा सवाल
यह पूरा मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यह शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के गृह जिले से जुड़ा है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब मंत्री के जिले में ही बच्चे तीन साल से अस्थायी व्यवस्था में पढ़ने को मजबूर हैं, तो दूर-दराज के क्षेत्रों की स्थिति कैसी होगी?

ग्रामीणों की मांग
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग से तत्काल नए स्कूल भवन की स्वीकृति या जर्जर भवन की मरम्मत कराने की मांग की है। उनका कहना है कि शिक्षा बच्चों का अधिकार है, और उन्हें सुरक्षित व व्यवस्थित वातावरण में पढ़ाई का अवसर मिलना चाहिए।

 

 

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