केपी यादव को क्यों मिला Grand gift! सिंधिया को हराने वाले यादव को बड़ा ज़िम्मा मिलने के अंदर की कहानी..शाह का वादा मोहन ने निभाया

Edited By Himansh sharma, Updated: 26 Apr, 2026 11:49 AM

shah s promise fulfilled leader who defeated scindia gets major post

मध्यप्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बड़े राजनीतिक फैसले ने हलचल मचा दी है।

भोपाल/गुना। मध्यप्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बड़े राजनीतिक फैसले ने हलचल मचा दी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में तत्कालीन कांग्रेस प्रत्याशी और वर्तमान केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को गुना-शिवपुरी सीट पर करारी शिकस्त देने वाले पूर्व सांसद केपी यादव को आखिरकार पार्टी ने उनके लंबे राजनीतिक “त्याग” का इनाम दे दिया है।

राज्य सरकार ने केपी यादव को मध्यप्रदेश स्टेट सिविल सप्लाईज कॉर्पोरेशन (नागरिक आपूर्ति निगम – NAN) का अध्यक्ष नियुक्त किया है। इसके साथ ही भिंड भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष संजीव कांकर को उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है। दोनों का कार्यकाल दो वर्ष का रहेगा।

अमित शाह का वादा, मोहन सरकार ने निभाया

सूत्रों के मुताबिक यह नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं बल्कि एक पुराने राजनीतिक वादे की पूर्ति मानी जा रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में टिकट न मिलने के बाद केपी यादव को संगठन की ओर से आश्वासन दिया गया था कि उनके योगदान और “त्याग” को उचित सम्मान दिया जाएगा।

ग्वालियर की एक सभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि पार्टी केपी यादव के योगदान को नहीं भूलेगी और उन्हें सम्मानजनक जिम्मेदारी दी जाएगी। अब मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार ने उस भरोसे को औपचारिक रूप से पूरा कर दिया है।

सिंधिया को हराने से लेकर टिकट कटने तक का सफर

राजनीतिक रूप से यह कहानी बेहद दिलचस्प रही है। 2019 में केपी यादव ने कांग्रेस के दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को उनके ही गढ़ गुना-शिवपुरी में हराकर बड़ा राजनीतिक उलटफेर किया था। लेकिन बाद में जब सिंधिया भाजपा में शामिल हुए, तो समीकरण पूरी तरह बदल गए और 2024 में केपी यादव का टिकट काट दिया गया।

उस समय इसे संगठन का कठिन लेकिन रणनीतिक निर्णय माना गया था, हालांकि भीतरखाने यह सवाल भी उठा था कि जिसने सिंधिया जैसे बड़े चेहरे को हराया, उसके साथ पार्टी का अगला कदम क्या होगा।

राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज

अब उनकी नियुक्ति के बाद राजनीतिक गलियारों में इसे “वादा निभाने की मिसाल” के तौर पर देखा जा रहा है। भाजपा के अंदर भी इसे संगठनात्मक संतुलन और पुराने कार्यकर्ताओं को सम्मान देने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक,यह फैसला सिर्फ नियुक्ति नहीं बल्कि संदेश है कि संगठन में योगदान और निष्ठा को अंततः पहचान मिलती है।

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