Edited By meena, Updated: 03 Feb, 2026 05:00 PM

गांव में सन्नाटा पसरा है। दहशत इतनी कि गरीबों की हलक से निवाला तक नहीं उतर रहा। 40 साल से पीढ़ियां जिस जमीन पर हल जोतकर, पसीने और उम्मीदों से अपनी जिंदगी की गाड़ी खींच रही थी...
गुना (मिस्बाह नूर) : गांव में सन्नाटा पसरा है। दहशत इतनी कि गरीबों की हलक से निवाला तक नहीं उतर रहा। 40 साल से पीढ़ियां जिस जमीन पर हल जोतकर, पसीने और उम्मीदों से अपनी जिंदगी की गाड़ी खींच रही थीं, अब एक अनजानी आफत ने पूरी बस्ती को अपने खौफ के आगोश में समेट लिया है।
डिप्टी रेंजर की हिदायत जैसे कानों में थप्पड़ बनकर गूंज रही है: "यह जमीन अब वन विभाग की है। यह गांव जल्द से जल्द खाली कर दें, वरना..." पीढ़ियों की मेहनत, घरों की यादें, फसलें और उम्मीदें...सब खतरे में हैं। इस डर और अनिश्चितता की चपेट में दलित और आदिवासी परिवारों की पूरी दुनिया थर्रा रही है। उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा। सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा नज़र आ रहा है। यह कहानी है गुना शहर के नज़दीक बजरंगगढ़ थाना क्षेत्र के ग्राम भिलेरा के गरीब दलित आदिवासी किसानों की बस्ती की।
कलेक्ट्रेट आए इन सीधे सादे ग्रामीणों के मुंह से बोल नहीं निकल पा रहे। अपनी व्यथा सुनाते हुए ग्रामीणों ने बताया कि वह करीब 40 वर्षों से जिस जमीन पर निवास और खेती कर रहे हैं, उसे अब वन विभाग अपनी बताकर खाली करने का दबाव बना रहा है। कार्रवाई से घबराए एक ग्रामीण ने जिला प्रशासन के सामने चेतावनी दी है कि यदि उन्हें बेदखल किया गया, तो वह अपने परिवार सहित गांव के तालाब में डूबकर जान दे देगा।

ग्रामीण भामा बंजारा और अन्य निवासियों ने बताया कि वे पिछले 4 दशकों से इस जमीन पर काबिज हैं। बताया जा रहा है कि यह जमीन पहले राजस्व विभाग के अधीन थी, जिसे बाद में वन विभाग को हस्तांतरित कर दिया गया। इसी हस्तांतरण के बाद से ही वन विभाग ग्रामीणों को वहां से हटाने का प्रयास कर रहा है। वर्तमान में इस विवादित करीब 40 बीघा जमीन पर हरिजन, आदिवासी, माली, काछी, कुम्हार और बंजारा समाज के लगभग 25 परिवार निवास कर रहे हैं। ग्रामीणों की चिंता का मुख्य वजह यह है कि अधिकांश परिवारों ने जमीन पर खरीफ की फसल बो रखी है। उनके पक्के और कच्चे मकान इसी जमीन पर बने हुए हैं। हाल ही में डिप्टी रेंजर द्वारा दी गई बेदखली की हिदायत के बाद से पूरे गांव में दहशत का माहौल है। ग्रामीणों ने गुहार लगाई है कि उनकी फसलों को नष्ट होने से बचाया जाए और उन्हें बेघर न किया जाए। मामले की गंभीरता और ग्रामीण की आत्मघाती चेतावनी को देखते हुए कलेक्टर किशोर कन्याल ने तत्काल संज्ञान लिया है। उन्होंने आश्वस्त किया है कि मौके पर जांच के लिए एक टीम भेजी जाएगी जो राजस्व और वन विभाग के रिकॉर्ड का मिलान कर वस्तुस्थिति स्पष्ट करेगी। फिलहाल वन विभाग की चेतावनी मिलने के बाद ग्रामीणों में दहशत व्याप्त है और वह कलेक्टर से संरक्षण की उम्मीद लगा रहे हैं।
सवाल यह है कि राजस्व और वन विभाग ने एक दूसरे से ज़मीन बदल ली इसकी सज़ा दलित आदिवासी किसान क्यों भुगते? 40 साल से उसपर काबिज़ हैं खेती कर रहे हैं और एक झटके में ज़मीनें आपस मे बदलने का कदम उठाकर वन विभाग ने बेदखली की चेतावनी दे दी। क्या यह नीति सही है?