Edited By Himansh sharma, Updated: 03 Jan, 2026 02:51 PM

डोंगरगढ़ और खैरागढ़ के बीच स्थित वन क्षेत्र में शुक्रवार को एक बार फिर तेंदुए की मौत ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
खैरागढ़। (हेमंत पाल): डोंगरगढ़ और खैरागढ़ के बीच स्थित वन क्षेत्र में शुक्रवार को एक बार फिर तेंदुए की मौत ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। ताजा मामला डोंगरगढ़ वन परिक्षेत्र अंतर्गत रानीगंज क्षेत्र का है, जहां एक तेंदुआ मृत अवस्था में मिला। यह कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि बीते कुछ समय से इसी वन क्षेत्र में लगातार तेंदुओं की मौत की घटनाएं सामने आ रही हैं, इसके बावजूद वन विभाग का रवैया ढुलमुल और गैर-जिम्मेदाराना नजर आ रहा है। वन विभाग के अनुसार मृत तेंदुए का डॉक्टरों की टीम से पोस्टमार्टम कराया गया और बाद में दाह संस्कार की प्रक्रिया भी पूरी कर दी गई। विभागीय दावा है कि तेंदुए को इंटरनल इंज्यूरी थी और उसकी मौत प्राकृतिक कारणों से हुई है।
इस संबंध में डीएफओ आयुष जैन ने भी इसे प्राकृतिक मृत्यु बताया है। लेकिन जिस तरह से पोस्टमार्टम और दाह संस्कार की कार्रवाई बिना व्यापक जानकारी सार्वजनिक किए की गई, उसने पूरे मामले को और संदिग्ध बना दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि मौत प्राकृतिक है, तो फिर डोंगरगढ़ खैरागढ़ के इसी बेल्ट में बार-बार तेंदुओं की जान क्यों जा रही है? क्या यह महज संयोग है या फिर इसके पीछे वन विभाग की कमजोर निगरानी, लचर गश्त और समय पर कार्रवाई न करना जिम्मेदार है?
इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए यह तथ्य भी अहम है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहले ही तेंदुए और अन्य वन्यजीवों की संदिग्ध मौतों पर संज्ञान ले चुका है। हाईकोर्ट ने पूर्व के मामलों में अवैध शिकार और वन्यजीव सुरक्षा में चूक को लेकर वन विभाग से जवाब तलब किया था और स्पष्ट निर्देश दिए थे कि ऐसी घटनाओं की पारदर्शी और प्रभावी जांच की जाए। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर हालात में कोई ठोस सुधार नजर नहीं आ रहा है। लगातार हो रही मौतों ने यह साफ कर दिया है कि वन विभाग न तो संवेदनशीलता के साथ मामले को ले रहा है और न ही वन्यजीव सुरक्षा को लेकर कोई ठोस रणनीति जमीन पर उतार पा रहा है। गश्त, निगरानी और इंटेलिजेंस तंत्र की कमजोर कड़ी अब उजागर हो चुकी है।
यही कारण है कि हर नई मौत के बाद सवालों का अंबार खड़ा हो जाता है और जवाब देने के बजाय विभाग केवल औपचारिक बयान जारी कर जिम्मेदारी से बचता नजर आता है। वन्यजीव प्रेमियों और स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते स्वतंत्र एजेंसी से जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट को सार्वजनिक करना और हाईकोर्ट के निर्देशों का सख्ती से पालन नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यह क्षेत्र वन्यजीवों के लिए और भी असुरक्षित हो जाएगा।
फिलहाल तेंदुए की इस ताजा मौत ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि वन विभाग की लापरवाही और ढुलमुल रवैया सिर्फ सवाल ही नहीं खड़े कर रहा, बल्कि पूरे वन्यजीव संरक्षण तंत्र की पोल खोल रहा है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या विभाग केवल इसे “प्राकृतिक मौत” बताकर मामला दबा देगा, या फिर हाईकोर्ट की सख्ती के बाद कोई ठोस और जवाबदेह कार्रवाई सामने आएगी।