फर्जी डिग्री से सरकारी नौकरी! शिक्षा विभाग में बड़ा घोटाला, धमधा के शिक्षक पर गंभीर आरोप

Edited By Himansh sharma, Updated: 03 Nov, 2025 12:33 PM

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छत्तीसगढ़ का शिक्षा विभाग एक बार फिर सवालों के घेरे में है।

दुर्ग। (हेमंत पाल): छत्तीसगढ़ का शिक्षा विभाग एक बार फिर सवालों के घेरे में है। धमधा विकासखंड के ग्राम दनिया (बोरी) में पदस्थ सहायक शिक्षक देव सिंह लोधी पर फर्जी डिग्री के आधार पर सरकारी नौकरी पाने का गंभीर आरोप लगा है। मामले ने पूरे जिले में हलचल मचा दी है क्योंकि यह वही विभाग है, जो हर साल “योग्यता और पारदर्शिता” के नाम पर भर्ती प्रक्रिया चलाता है, लेकिन अंदरखाने फर्जी प्रमाणपत्रों का खेल खुलेआम जारी है।

 फर्जी डिग्री से मिली सरकारी नौकरी!

मिली जानकारी के अनुसार, देव सिंह लोधी पिता बिसौहा लोधी, निवासी ग्राम पेटी ने नौकरी पाने के लिए “भारतीय शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश” से प्राप्त स्नातक और बी.एड. की डिग्री प्रस्तुत की थी। लेकिन जांच में सामने आया कि  यह परिषद किसी भी सरकारी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय की सूची में शामिल नहीं है। प्रस्तुत की गई मार्कशीट और प्रमाण पत्र पर न तो नियंत्रणकर्ता का हस्ताक्षर है, न ही केन्द्राध्यक्ष का।बी.एड. और ग्रेजुएशन दोनों में एक ही एनरोलमेंट नंबर इस्तेमाल किया गया है जो तकनीकी रूप से असंभव है।

जब रिजल्ट पोर्टल पर जांच की गई, तो कोई भी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं मिला। यानी, दस्तावेज़ पूरी तरह संदिग्ध हैं। 

12वीं में थर्ड डिवीजन, ग्रेजुएशन में फर्स्ट क्लास!

एक और बड़ा सवाल देव सिंह की शैक्षणिक यात्रा को लेकर उठ रहा है।
12वीं कक्षा में उन्होंने थर्ड डिवीजन (हिन्दी माध्यम) से परीक्षा पास की थी, जबकि डिग्री सर्टिफिकेट में फर्स्ट डिवीजन (अंग्रेज़ी माध्यम) दर्शाया गया है। शिक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, यह अकादमिक रूप से बेहद असामान्य है और डिग्री की प्रामाणिकता पर और भी बड़ा सवाल खड़ा करता है।

फर्जी प्रमाणपत्र माफिया का नेटवर्क

स्थानीय सूत्र बताते हैं कि यह कोई पहला मामला नहीं है। वर्षों से शिक्षा विभाग में “फर्जी प्रमाणपत्र माफिया” सक्रिय हैं — जो बिना वैरिफिकेशन के दस्तावेज लगवाकर लोगों को नियुक्ति दिलवा देते हैं। बताया जाता है कि “भारतीय शिक्षा परिषद” जैसे नामों वाली संस्थाएं मान्यता रहित होते हुए भी कागज़ी डिग्रियां बेचती हैं, और कुछ अधिकारी चुपचाप आंख मूंद लेते हैं।

 फर्जी दिव्यांग सर्टिफिकेट का भी खेल

दुर्ग जिले में केवल डिग्री ही नहीं, बल्कि दिव्यांग प्रमाण पत्रों का फर्जीवाड़ा भी तेजी से फैल रहा है। सूत्र बताते हैं कि कई शिक्षक “कान”, “आंख” या “पैर” की फर्जी दिव्यांगता दिखाकर नौकरी और प्रमोशन हासिल कर चुके हैं। अगर इन मामलों की गंभीर जांच की जाए, तो दर्जनों ऐसे शिक्षकों के नाम सामने आ सकते हैं जो वर्षों से शासन की आंखों में धूल झोंक रहे हैं।

 अब सवाल सीधे शिक्षा विभाग पर

आखिर बिना मान्यता प्राप्त संस्थान की डिग्री पर नियुक्ति कैसे हो गई? दस्तावेज़ों का सत्यापन करने वाले अधिकारी कहां थे? क्या विभाग की स्क्रीनिंग प्रक्रिया सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई है?

 जवाबदेही तय होनी चाहिए

शिकायतकर्ता ने देव सिंह लोधी की नियुक्ति और प्रमाण पत्रों की न्यायिक जांच की मांग की है, साथ ही उसे नियुक्त करने वाले अधिकारियों पर भी आपराधिक कार्यवाही की मांग की गई है।

अब नजरें शिक्षा विभाग पर हैं 
क्या विभाग इस घोटाले की पारदर्शी जांच करेगा या एक बार फिर “फाइल दबाने” की पुरानी परंपरा दोहराई जाएगी?

गृह जिले में लापरवाही शिक्षा मंत्री पर भी सवाल

यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि दुर्ग, राज्य के शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव का गृह जिला है।
और जब मंत्री के अपने जिले में ही इस तरह के फर्जीवाड़े सामने आएं, तो सवाल उठना लाजमी है 
क्या शिक्षा विभाग अपनी ही साख बचा पाएगा?

ईमानदार अभ्यर्थियों के साथ अन्याय

हर साल हजारों युवा शिक्षक बनने के लिए तैयारी करते हैं, परीक्षा पास करते हैं, मेरिट लिस्ट में नाम आने का इंतजार करते हैं। लेकिन जब किसी “फर्जी डिग्रीधारी” को नौकरी मिल जाती है, तो मेहनती अभ्यर्थियों का भरोसा तंत्र से उठ जाता है।

अब शिक्षा विभाग की अग्निपरीक्षा

अब यह देखना होगा कि शिक्षा विभाग इस पूरे मामले पर क्या कदम उठाता है। क्या यह महज़ एक शिकायत बनकर फाइलों में दब जाएगी या फिर विभाग वास्तव में फर्जी डिग्री माफिया के नेटवर्क पर शिकंजा कसने की हिम्मत दिखाएगा?

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