हाइकोर्ट का आया बड़ा फैसला, ‘इंक्रीमेंट’ और ‘टाइम स्केल वेतन पर बेहद अहम आदेश

Edited By Desh sharma, Updated: 04 Feb, 2026 04:56 PM

high court s major order on  increment  and  time scale salary

इंक्रीमेंट’ और टाइम स्केल वेतन पर हाइकोर्ट का एक बड़ा आदेश सामने आया है। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि बिना वास्तविक सेवा किए केवल वरिष्ठता के आधार पर ही इंक्रीमेंट और टाइम-स्केल वेतन का लाभ नहीं दिया जा सकता है।

(ग्वालियर): इंक्रीमेंट’ और टाइम स्केल वेतन पर हाइकोर्ट का एक बड़ा आदेश सामने आया है। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि बिना वास्तविक सेवा किए केवल वरिष्ठता के आधार पर ही इंक्रीमेंट और टाइम-स्केल वेतन का लाभ नहीं दिया जा सकता है। हाइकोर्ट का ये फैसला काफी अहम माना जा रहा है।

बिना वास्तविक सेवा,वरिष्ठता आधार पर इंक्रीमेंट और टाइम-स्केल वेतन का लाभ नहीं दिया जा सकता

हाईकोर्ट की एकल पीठ ने सहायक जिला अभियोजन अधिकारी पद से जुड़े दो मामलों में बेहद ही आदेश देते हुए ये साफ कर दिया है। कोर्ट ने सशंय मिटाते हुए कहा कि बिना वास्तविक सेवा केवल वरिष्ठता के आधार पर इंक्रीमेंट और टाइम-स्केल वेतन का लाभ नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि केवल चयन सूची में नाम होना या पिछली तिथि से वरिष्ठता का दावा, वास्तविक काम  किए बिना वेतन वृद्धि का आधार नहीं बन सकता है।

ये याचिका मयंक भारद्वाज और अन्य ने हाईकोर्ट में दायर की थी। याचिकाकर्ताओं ने याचिका दाखिल करके  तर्क दिया था कि साल 2011 की चयन सूची में उनका स्थान निर्धारित था। इसके चलते उन्हें साल 2011 से ही इंक्रीमेंट और 8 वर्ष पूरे होने पर टाइम-स्केल वेतन का लाभ मिलना चाहिए।

सुनवाई के दौरान कहा गया कि नियुक्ति में देरी उनके कारण नहीं थी, इसलिए वेतन संबंधी लाभों से महरुम नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति साल 2016 में हुई और ग्रेडेशन सूची में भी वरिष्ठता उसी वर्ष से दर्शाई गई है।

इस पर कोर्ट ने कहा कि केवल चयन सूची में नाम होना या फिर पिछली तिथि से वरिष्ठता का दावा करना वास्तविक कार्य किए बिना वेतन वृद्धि का आधार नहीं बन सकता है। कोर्ट दो टूक कह दिया कि  जब याचिकाकर्ताओं ने 2011 से 2016 के बीच कोई काम ही नहीं किया, तो उस अवधि के लिए इंक्रीमेंट देने का प्रश्न ही नहीं उठता है। इसके साथ ही  टाइम-स्केल वेतन के लिए भी विभागीय मूल्यांकन आवश्यक है, जो बिना कार्य निष्पादन के संभव नहीं है। लिहाजा हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाएं खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं को झटका दे दिया।

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