विधायक निर्मला सप्रे मामले में कांग्रेस को बड़ा झटका, हाईकोर्ट का फैसला आया सामने

Edited By Himansh sharma, Updated: 25 Jun, 2026 09:15 PM

high court verdict out in nirmala sapre case congress faces major blow

मध्य प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से चर्चा का विषय बने बीना विधायक निर्मला सप्रे प्रकरण में कांग्रेस को बड़ा कानूनी झटका लगा है।

भोपाल/जबलपुर। मध्य प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से चर्चा का विषय बने बीना विधायक निर्मला सप्रे प्रकरण में कांग्रेस को बड़ा कानूनी झटका लगा है। जबलपुर हाईकोर्ट ने नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें दल-बदल कानून के तहत निर्मला सप्रे की विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की मांग की गई थी। अदालत के इस फैसले के बाद फिलहाल सप्रे की विधायकी पर मंडरा रहा तत्काल संकट टल गया है और अब पूरा मामला विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय पर निर्भर करेगा।

दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान सागर जिले के राहतगढ़ में आयोजित एक कार्यक्रम में बीना से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मंच पर पहुंची थीं। इसी मंच से उनके भाजपा में शामिल होने की चर्चाओं ने जोर पकड़ा था। इसके बाद कांग्रेस ने इसे दल-बदल का मामला बताते हुए विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष उनकी सदस्यता समाप्त करने की मांग की थी।

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने 30 जून 2024 को विधानसभा अध्यक्ष को आवेदन सौंपकर दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई की मांग की थी। कांग्रेस का आरोप था कि निर्धारित अवधि में इस मामले पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, जिसके चलते न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करते हुए हाईकोर्ट का रुख किया गया।

हालांकि सुनवाई के दौरान निर्मला सप्रे की ओर से पेश पक्ष ने मामले को नया मोड़ दे दिया। उनके वकील ने अदालत को बताया कि सप्रे ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा अवश्य दिया है, लेकिन उन्होंने औपचारिक रूप से भाजपा की सदस्यता ग्रहण नहीं की है। ऐसे में दल-बदल का आरोप तथ्यों के अनुरूप नहीं है।

मामले की सुनवाई कर रही हाईकोर्ट की युगलपीठ ने स्पष्ट किया कि विधानसभा अध्यक्ष इस प्रकरण की जांच कानूनी प्रक्रिया के तहत कर रहे हैं। अदालत ने माना कि वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा कोई असाधारण कारण नहीं है, जिसके आधार पर न्यायालय विधानसभा अध्यक्ष को समयबद्ध निर्णय लेने का निर्देश दे। इसी आधार पर याचिका को निरस्त कर दिया गया।

इस फैसले के राजनीतिक मायने भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। कांग्रेस जहां इसे अपनी रणनीतिक लड़ाई में एक बड़ा झटका मान रही है, वहीं भाजपा खेमे में इसे राहत के रूप में देखा जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने मामले के गुण-दोष पर अंतिम टिप्पणी करने से परहेज करते हुए फैसला विधानसभा अध्यक्ष पर छोड़ दिया है।

अब सभी निगाहें विधानसभा अध्यक्ष के अगले कदम पर टिकी हैं। यदि जांच के बाद कोई निर्णायक आदेश आता है, तो प्रदेश की राजनीति में एक नया अध्याय खुल सकता है। फिलहाल इतना तय है कि निर्मला सप्रे की विधायकी सुरक्षित है, लेकिन राजनीतिक और कानूनी विवाद अभी समाप्त नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में यह मामला बुंदेलखंड ही नहीं, पूरे मध्य प्रदेश की राजनीति का केंद्र बना रह सकता है।

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