Edited By Himansh sharma, Updated: 01 Mar, 2026 01:14 PM

त्योहार को देखते हुए धमधा क्षेत्र में पुलिस की ताबड़तोड़ कार्रवाई जारी है।
धमधा (हेमंत पाल): त्योहार को देखते हुए धमधा क्षेत्र में पुलिस की ताबड़तोड़ कार्रवाई जारी है। रोजाना 30 से 50 पाव तक अवैध शराब जब्त की जा रही है। जब से धमधा थाना प्रभारी के रूप में रामनारायण ध्रुव ने पदभार संभाला है, तब से अवैध शराब के खिलाफ सख्ती साफ नजर आ रही है। लेकिन इन कार्रवाइयों के बीच सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो गया है जब पुलिस लगातार पकड़ रही है, तो इतनी बड़ी मात्रा में शराब आखिर आ कहां से रही है?
नियम 16 पाव का, बिक्री 50 पाव तक?
आबकारी नियमों के अनुसार एक व्यक्ति को अधिकतम 16 पाव शराब ही दी जा सकती है। इसके बावजूद धमधा शराब भट्टी से 20, 30 यहां तक कि 50 पाव तक एक ही व्यक्ति को दिए जाने की चर्चा जोरों पर है। यदि जमीनी हकीकत यही है, तो यह सीधे-सीधे आबकारी नियमों की अनदेखी है।
क्षेत्र में चर्चा है कि शराब कोचियों को खुलकर माल उपलब्ध कराया जा रहा है। यही कारण है कि पुलिस चाहे जितनी कार्रवाई कर ले, सप्लाई लाइन बंद नहीं हो पा रही है।
पुलिस एक्शन में, आबकारी रिएक्शन में क्यों नहीं?
एक ओर पुलिस रोज अभियान चलाकर जब्ती कर रही है, वहीं आबकारी विभाग की तरफ से धमधा क्षेत्र में ठोस कार्रवाई नजर नहीं आ रही। आखिर क्यों?
यदि भट्टी से ही नियमों की अनदेखी हो रही है, तो जिम्मेदारी तय कौन करेगा?
बरहमपुर चौक और शराब भट्टी के आसपास चखना सेंटर खुलेआम संचालित हो रहे हैं। ढाबों और दुकानों में शराब परोसे जाने की शिकायतें आम हैं। सवाल यह है कि आबकारी अमला इन गतिविधियों से अनजान है या फिर आंख मूंदे बैठा है?
अधिकारी चुप क्यों?
इस मामले में जब धमधा आबकारी प्रभारी भोजराम से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने जवाब देना जरूरी नहीं समझा। अधिकारी की यह चुप्पी कई सवालों को जन्म दे रही है।
बड़ा सवाल जिम्मेदारी किसकी?
त्योहार के दौरान कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी केवल पुलिस की नहीं, बल्कि आबकारी विभाग की भी है। यदि सप्लाई स्रोत पर ही सख्ती नहीं होगी, तो क्या केवल छोटी-छोटी जब्ती से अवैध कारोबार पर रोक लग पाएगी? अब देखना यह है कि क्या उच्च अधिकारी पूरे मामले की जांच करेंगे?
क्या धमधा शराब भट्टी की बिक्री का रिकॉर्ड खंगाला जाएगा?
क्या आबकारी विभाग अपनी भूमिका स्पष्ट करेगा?
धमधा में अवैध शराब का मुद्दा अब केवल कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह विभागीय जवाबदेही का प्रश्न बनता जा रहा है।