MP में मंत्री की कुर्सी खतरे में? जाति प्रमाणपत्र विवाद से बढ़ी सियासी हलचल

Edited By Vandana Khosla, Updated: 28 Apr, 2026 01:46 PM

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भोपाल: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नगरीय प्रशासन राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र से जुड़े मामले में राज्य स्तरीय छानबीन समिति को 60 दिनों के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं। यह मामला अब राजनीतिक बयानबाज़ी और आरोप-प्रत्यारोप के चलते और...

भोपाल: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नगरीय प्रशासन राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र से जुड़े मामले में राज्य स्तरीय छानबीन समिति को 60 दिनों के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं। यह मामला अब राजनीतिक बयानबाज़ी और आरोप-प्रत्यारोप के चलते और अधिक गरमा गया है। दरअसल, कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। अदालत ने 24 अप्रैल को सुनवाई के दौरान मामले का अंतिम निर्णय छानबीन समिति पर छोड़ दिया।

मंत्री प्रतिमा बागरी का बयान
विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए मंत्री प्रतिमा बागरी ने कहा कि यह मुद्दा नया नहीं है और समय-समय पर उठाया जाता रहा है। उन्होंने इसे “लाइमलाइट पाने की कोशिश” बताते हुए कहा कि उनके खिलाफ पहले भी इसी तरह की याचिका दाखिल की गई थी, जिसे बाद में वापस ले लिया गया था। मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि उनके पास अभी तक कोई आधिकारिक पत्राचार नहीं आया है और जरूरत पड़ने पर वे सभी दस्तावेज उपलब्ध कराएंगी। उन्होंने यह भी कहा कि “कांग्रेस के भी बागरी समाज से विधायक रहे हैं,” इसलिए इस मुद्दे को बेवजह तूल दिया जा रहा है।

कांग्रेस का पलटवार
वहीं, कांग्रेस ने मंत्री के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह मामला व्यक्तिगत नहीं बल्कि समाजिक और कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह लड़ाई किसी प्रचार के लिए नहीं, बल्कि सत्य सामने लाने के लिए है।

क्या है पूरा मामला?
कांग्रेस नेता का आरोप है कि प्रतिमा बागरी ने गलत तरीके से अनुसूचित जाति (SC) प्रमाण पत्र प्राप्त कर आरक्षण का लाभ लिया और उसी आधार पर सतना जिले की रैगांव सीट से चुनाव जीतकर मंत्री पद तक पहुंचीं।

वहीं कांग्रेस का दावा है कि ‘बागरी’ जाति SC सूची में शामिल नहीं है और मंत्री मूल रूप से राजपूत (ठाकुर) समुदाय से आती हैं। याचिका में 1961-71 की जनगणना, 2003 समिति के फैसले और 2007 के राजपत्र का हवाला देते हुए यह दावा किया गया है। यह भी उल्लेख किया गया है कि इससे पहले इसी मामले में दाखिल एक याचिका को वापस ले लिया गया था, जबकि बाद में नए दस्तावेजों के साथ इसे फिर से दायर किया गया।

अब नजर समिति के फैसले पर
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब पूरी नजर राज्य स्तरीय छानबीन समिति पर टिकी है, जिसे 60 दिनों के भीतर इस मामले पर अंतिम निर्णय देना होगा। फैसला आने तक राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप जारी रहने के आसार हैं।


 

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