Edited By Himansh sharma, Updated: 29 Aug, 2026 05:58 PM
मध्य प्रदेश कांग्रेस में संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर सामने आने वाले विवादों पर लगाम लगाने के लिए पार्टी ने अब अपनी रणनीति बदलने का फैसला किया है।
भोपाल। मध्य प्रदेश कांग्रेस में संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर सामने आने वाले विवादों पर लगाम लगाने के लिए पार्टी ने अब अपनी रणनीति बदलने का फैसला किया है। आने वाले समय में जिला स्तर पर होने वाली नियुक्तियां किसी एक व्यक्ति की पसंद तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि संबंधित क्षेत्र के वरिष्ठ नेताओं की राय के बाद ही नामों को अंतिम रूप दिया जाएगा। दरअसल, कांग्रेस में संगठन की नियुक्तियों को लेकर कई बार अंदरूनी खींचतान देखने को मिली है। कहीं नियुक्ति का विरोध हुआ तो कहीं मामला इतना बढ़ा कि पार्टी को अपने ही फैसले पर दोबारा विचार करना पड़ा। कई मामलों में नियुक्तियां रद्द करने या दूसरे कार्यकर्ताओं को समायोजित करने की नौबत भी आई। इसका सीधा असर संगठन की गतिविधियों और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल पर पड़ा।
विवादों से कांग्रेस ने लिया सबक
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की कोशिश संगठन में ज्यादा से ज्यादा सहमति बनाने की रही है। हाल ही में संगठन सृजन अभियान के तहत केंद्रीय पर्यवेक्षकों की अनुशंसा पर जिलाध्यक्षों की नियुक्तियां की गई थीं। हालांकि, कई स्थानों पर इन फैसलों को लेकर असंतोष सामने आया। विरोध की आवाजें जिला मुख्यालयों से निकलकर भोपाल स्थित प्रदेश कांग्रेस कार्यालय तक पहुंचीं।
इन घटनाओं से सबक लेते हुए अब पार्टी जिला स्तर की आगामी नियुक्तियों में ज्यादा सावधानी बरत रही है। जिला कार्यकारिणियों के गठन के दौरान वरिष्ठ नेताओं से राय-मशविरा करने के बाद अपेक्षाकृत कम विवाद सामने आए। इसी मॉडल को अब अन्य संगठनात्मक नियुक्तियों में भी लागू करने की तैयारी है।
19 विभाग और 34 प्रकोष्ठों में होना है बड़ा संगठनात्मक विस्तार
कांग्रेस के सामने आने वाले दिनों में बड़ी संख्या में नियुक्तियां करने की चुनौती है। पार्टी के 19 विभागों और 34 प्रकोष्ठों में प्रदेश से लेकर जिला स्तर तक संगठनात्मक जिम्मेदारियां तय की जानी हैं। इसके अलावा अगले साल से चुनावी गतिविधियां भी तेज होने वाली हैं। ऐसे में पार्टी नहीं चाहती कि नियुक्तियों को लेकर कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच किसी तरह का मतभेद पैदा हो। इसी वजह से संगठन अब हर कदम पर व्यापक सहमति बनाने की नीति अपना रहा है।
पहले समन्वय समिति, फिर नियुक्ति
नई व्यवस्था के तहत जिला स्तर पर किसी पद के लिए नाम तय करने से पहले संबंधित समन्वय समिति में उस पर चर्चा होगी। जिला और संभाग स्तर पर बनी इन समितियों में क्षेत्र के विधायक, पूर्व विधायक, सांसद, पूर्व सांसद, पंचायत प्रतिनिधि, महापौर, नगर पालिका अध्यक्ष और संगठन से जुड़े वरिष्ठ नेता शामिल हैं। यानी अब जिलाध्यक्ष सीधे नाम भेजने के बजाय पहले समिति के सामने प्रस्ताव रखेंगे। समिति में प्रत्येक नाम पर चर्चा के बाद सूची तैयार होगी और फिर उसे प्रदेश कांग्रेस कार्यालय भेजा जाएगा।
छूटे कार्यकर्ताओं को भी मिलेगा मौका
पार्टी की कोशिश केवल विवाद रोकने की नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओं को प्रतिनिधित्व देने की भी है। यदि प्रदेश नेतृत्व को लगेगा कि किसी सक्रिय या योग्य कार्यकर्ता का नाम सूची में शामिल नहीं हुआ है, तो संबंधित संगठन को उस नाम पर दोबारा विचार करने के निर्देश दिए जा सकते हैं।
इस व्यवस्था से पार्टी के भीतर यह संदेश देने की कोशिश है कि संगठन में पद केवल कुछ चुनिंदा लोगों के लिए नहीं, बल्कि सक्रिय कार्यकर्ताओं की भागीदारी के आधार पर तय किए जाएंगे।
प्रदेश कार्यकारिणी में भी दिखेगा संतुलन
प्रदेश कांग्रेस संगठन महासचिव संजय कामले के मुताबिक पार्टी संगठनात्मक व्यवस्था का विकेंद्रीकरण कर रही है। उनका कहना है कि नियुक्तियों से लेकर अन्य महत्वपूर्ण निर्णयों तक अधिक से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी।
प्रदेश कांग्रेस की मौजूदा कार्यकारिणी को भी जल्द भंग किए जाने की तैयारी है। इसके स्थान पर नई टीम गठित होगी, जिसमें क्षेत्रीय, राजनीतिक और सामाजिक संतुलन पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। पार्टी नेतृत्व युवाओं को आगे लाने के साथ अनुभवी नेताओं के अनुभव का भी इस्तेमाल करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
कुल मिलाकर, मध्य प्रदेश कांग्रेस अब संगठन में नियुक्तियों को लेकर ‘एकतरफा फैसले’ की बजाय ‘सामूहिक सहमति’ के मॉडल पर आगे बढ़ने की तैयारी में है। आने वाले महीनों में होने वाली नियुक्तियां इस नई व्यवस्था की पहली बड़ी परीक्षा मानी जा रही हैं..