PM Modi Birthday Special: विष्णु दत्त शर्मा ने बताया कैसे मोदी युग में बदली भारत की पहचान

Edited By Himansh sharma, Updated: 16 Sep, 2026 04:11 PM

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के अवसर पर भाजपा के राष्ट्रीय संयोजक प्रकोष्ठ संकुल एवं खजुराहो लोकसभा सांसद विष्णु दत्त शर्मा ने उनके व्यक्तित्व और नेतृत्व को लेकर विशेष लेख लिखा है।

PM Modi Birthday: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के अवसर पर भाजपा के राष्ट्रीय संयोजक प्रकोष्ठ संकुल एवं खजुराहो लोकसभा सांसद विष्णु दत्त शर्मा ने उनके व्यक्तित्व और नेतृत्व को लेकर विशेष लेख लिखा है। उन्होंने मोदी के राजनीतिक सफर, राष्ट्रनिर्माण के संकल्प, गरीब कल्याण की योजनाओं, आर्थिक विकास, कूटनीति, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका का उल्लेख करते हुए इसे नए भारत के आत्मविश्वास से जोड़कर प्रस्तुत किया है। शर्मा ने अपने लेख में प्रधानमंत्री मोदी के जीवन-संघर्ष से लेकर देश के विकास की दिशा में किए गए प्रयासों को रेखांकित किया है।

उन्होंने लिखा कि यह सुखद संयोग है कि विश्वकर्मा जयंती के पावन दिन ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिवस भी है। आज के दिन ही 1950 में गुजरात के वडनगर में जन्मे नरेंद्र मोदी आज 75 वर्ष की आयु में भी उसी अथक ऊर्जा और संकल्प के साथ राष्ट्र-निर्माण के महायज्ञ में समर्पित हैं, जिस निष्ठा के साथ उन्होंने अपनी यात्रा आरंभ की थी। भारतीय चिंतन में कहा भी गया है- उद्योगपर्व सम्पन्नोति कर्मसिद्धिं न संशयः अर्थात कर्म की सिद्धि निरंतर उद्यम से ही संभव होती है, यह भारतीय चिंतन की मूल भावना उनके जीवन में साकार होती दिखाई देती है।  

सर्वविदित है कि जो राष्ट्र दशकों तक अपनी क्षमताओं को लेकर संकोच में जीता रहा, वही राष्ट्र आज मोदी जी की अगुवाई में बिना किसी हिचक के वैश्विक मंच पर अपनी शर्तों पर खड़ा दिखाई देता है। इसका ताजा प्रमाण पिछले सप्ताह, राजधानी दिल्ली के भारत मंडपम में संपन्न 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में मिला, जिसकी मेजबानी स्वयं प्रधानमंत्री मोदी जी ने की। ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालने के बाद उनके नेतृत्व में भारत ने आठ महीनों में साढ़े तीन सौ से अधिक बैठकों का सफल आयोजन कर विश्व को यह भरोसा दिलाया कि उनकी अगुवाई केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यावहारिक परिणामों की गारंटी है। उल्लेखनीय है कि पश्चिम एशिया के तनाव और सदस्य देशों के आपसी मतभेदों के बीच भी संयुक्त वक्तव्य पर सर्वसम्मति बनाना मोदी जी की उसी कूटनीतिक परिपक्वता का प्रमाण है, जिसने पूर्व में जी-20 के मंच पर भी विश्व को चकित किया था। लगभग सात वर्ष बाद चीनी और रूस जैसे देशों को एक साथ एक मंच पर लाना निःसंदेह उनकी उसी भगीरथ भूमिका की पुष्टि करता है, जिसके बल पर वे उभरती बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था में भारत को केंद्रीय स्थान दिला चुके हैं।

आर्थिक क्षेत्र में भी मोदी जी की नीतियों की गति किसी विजेता योद्धा से कम नहीं आँकी जा सकती। आज साढ़े सात प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि दर मोदी जी के सुधारवादी नेतृत्व और एक सौ चालीस करोड़ भारतीयों की उस निष्ठा का संयुक्त प्रतिबिंब है, जो उनके आह्वान पर राष्ट्र-उत्थान में स्वयं को समर्पित किये हुए है। इसी दौर में मोदी सरकार ने चौदह देशों के साथ सैंतीस अरब डॉलर से अधिक के व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर कराए, जिनमें न्यूजीलैंड के साथ हुआ मुक्त व्यापार समझौता विशेष उल्लेखनीय है। इस समझौते ने भारतीय निर्यात को शुल्क-मुक्त पहुँच के साथ-साथ हजारों कुशल भारतीय कामगारों के लिए नया वीजा मार्ग भी खोल दिया।

इन सबके बीच सबसे अधिक स्मरणीय वह संवेदनशीलता है, जिसके साथ मोदी जी ने गरीबों के जीवन को केंद्र में रखकर अपनी नीतियाँ गढ़ी हैं। जनधन योजना ने करोड़ों निर्धन परिवारों को पहली बार बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा, तो उज्ज्वला योजना ने धुँए से भरी रसोई में जीवन बिताने वाली माताओं-बहनों को स्वच्छ ईंधन का सुख दिया। आयुष्मान भारत ने गंभीर बीमारी को गरीब परिवार के लिए विपदा बनने से रोका, प्रधानमंत्री आवास योजना ने बेघरों को पक्की छत दी, और किसान सम्मान निधि ने अन्नदाता की जेब तक सीधी सहायता पहुँचाई। डीबीटी और डिजिटल प्लेटफार्मों के माध्यम से यह सहायता बिचौलियों के बिना, पारदर्शी ढंग से लाभार्थी तक पहुँच रही है, जिससे भ्रष्टाचार की वह जड़ ही कट गई, जो वर्षों तक गरीब के हक को छीनती रही। यही कारण है कि मोदी जी को देश के करोड़ों वंचितों का सच्चा मसीहा कहा जाता है, उनकी उपलब्धियाँ केवल कूटनीतिक कक्षों की शोभा नहीं, बल्कि किसी गाँव की झोपड़ी में जलते चूल्हे और किसी निर्धन के सिर पर बनी छत में भी उतनी ही स्पष्टता से दिखाई देती हैं।

तकनीकी आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में भी मोदी जी के मार्गदर्शन में भारत निरंतर नये कीर्तिमान रच रहा है। कुछ दिन पहले ही इसरो ने अपने प्रक्षेपण यान जीएसएलवी-एफ17 के माध्यम से पृथ्वी रिमोट सेंसिंग उपग्रह को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया, जो उनकी आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना का सजीव प्रमाण है। इसके समानांतर मानव अंतरिक्ष यान कार्यक्रम गगनयान और भविष्य के बहु-मॉड्यूल अंतरिक्ष स्टेशन की दिशा में जारी प्रयास यह स्पष्ट करते हैं कि जो भारत कभी अंतरिक्ष-प्रौद्योगिकी के लिए दूसरों पर निर्भर था, वह मोदी जी के नेतृत्व में अब स्वयं इस क्षेत्र में विश्वगुरु बनने की राह पर अग्रसर है। रक्षा क्षेत्र में भी उनकी दूरदर्शिता नई परिभाषा गढ़ रही है। हाल ही में जोधपुर में आयोजित ‘एक्सरसाइज वीर गार्डियन 2026’ के अंतर्गत जापान की एयर सेल्फ-डिफेंस फोर्स के लड़ाकू विमानों की पहली बार भारत यात्रा मोदी सरकार के सुदृढ़ रक्षा सहयोग का प्रतीक बनी, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता को केंद्र में रखने वाले एक व्यापक नेटवर्क का संकेत देती है।

इन सभी उपलब्धियों के बीच एक साझा सूत्र स्पष्ट रूप से उभरता है, वह यह कि मोदी जी प्रतिक्रियावादी नीति के बजाय दूरदर्शी योजना के आधार पर भारत के भविष्य का निर्माण कर रहे हैं। कभी जो राष्ट्र वैश्विक निर्णयों का मूकदर्शक बना रहता था, वही आज उनके नेतृत्व में ब्रिक्स की मेजबानी से लेकर व्यापार-समझौतों और अंतरिक्ष-रक्षा सहयोग तक हर मोर्चे पर निर्णायक की भूमिका निभा रहा है। निःसंदेह, इन उपलब्धियों का सबसे बड़ा लाभार्थी भारत का आम नागरिक ही है, और यही किसी भी नेतृत्व की सबसे बड़ी कसौटी भी है। आर्थिक वृद्धि तब सार्थक होती है, जब वह रोजगार और उद्यमिता के नए अवसरों में बदलती है। अंतरिक्ष तकनीक तब जनोपयोगी बनेगी, जब उसका लाभ कृषि, स्वास्थ्य और आपदा-प्रबंधन तक पहुँचेगा। व्यापार समझौते तब सफल माने जाएँगे, जब वे युवाओं के लिए नए अवसरों और भारतीय उद्यमों के लिए व्यापक बाजारों का निर्माण करेंगे। वैश्विक मंच पर मिली प्रतिष्ठा तभी वास्तविक अर्थों में सार्थक होगी, जब उसका उजाला देश के अंतिम व्यक्ति के जीवन तक पहुँचेगा। मोदी जी इस कसौटी पर लगातार खरे उतरे हैं। 

बचपन में पिता की चाय की दुकान में हाथ बँटाने वाले उसी नरेंद्र मोदी ने माँ हीराबेन के संस्कारों से ईमानदारी, श्रम और राष्ट्रभक्ति की जो शिक्षा पाई थी, वही आज उनके प्रशासनिक जीवन की रीढ़ बनी हुई है। कठिन परिश्रम, अडिग संकल्प और राष्ट्रप्रेम से भरी उनकी यह जीवन-यात्रा हमें यह सिखाती है कि साधारण परिस्थितियों से भी असाधारण ऊँचाइयों तक पहुँचा जा सकता है। उनके इस जन्मदिवस पर देशवासियों की यही मंगलकामना है कि उनका यह संकल्प-पथ निरंतर प्रशस्त होता रहे।

जब वर्ष 2047 में भारत अपनी स्वाधीनता का शताब्दी वर्ष मनाएगा, तब आज का यह दौर निश्चय ही एक महत्वपूर्ण परिवर्तन-काल के रूप में स्मरण किया जाएगा। वह काल, जिसमें वैश्विक कूटनीति, आर्थिक शक्ति और तकनीकी आत्मनिर्भरता को एक साथ साधते हुए भारत की नई पहचान गढ़ने का प्रयास हुआ। विश्वकर्मा जयंती के दिन जन्मे नरेंद्र मोदी वास्तव में नये भारत के विश्वकर्मा हैं, जिनके संकल्प, साधना और सेवा-भाव ने राष्ट्र को आत्मविश्वास का नया शिखर दिया है। संकल्प से सिद्धि की ओर बढ़ता भारत ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस विश्वकर्मा-युग की सबसे बड़ी पहचान है।

लेखक राष्ट्रीय संयोजक प्रकोष्ठ संकुल भाजपा एवं खजुराहो लोकसभा से सांसद हैं..

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