Edited By meena, Updated: 28 May, 2026 03:41 PM

राजधानी भोपाल से इस वक्त की बड़ी खबर सामने आ रही है, यहां प्रसिद्ध उर्दू कवि बशीर बद्र का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वे 91 वर्ष के थे...
भोपाल : राजधानी भोपाल से इस वक्त की बड़ी खबर सामने आ रही है, यहां प्रसिद्ध उर्दू कवि बशीर बद्र का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वे 91 वर्ष के थे। पारिवारिक सूत्रों ने जानकारी देते हुए बताया कि कवि ने भोपाल स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली। जानकारी के मुताबिक, उर्दू अदब की रूह में समाए डॉ बशीर बद्र तक़रीबन 14 बरस से डिमेंशिया के शिकार थे, जिससे उनकी याददाश्त कमजोर होती चली गई थी।
1972 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए शिमला समझौते के दौरान, बद्र ने यह मशहूर शेर लिखा था: "दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।"
उनके अन्य मशहूर शेर हैं: "कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई बेवफा नहीं होता", "उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए", और "लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में"। मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने बद्र के निधन पर शोक व्यक्त किया।
अख्तर ने 'X' (ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए लिखा, "आज हमारी ज़बान उर्दू थोड़ी और गरीब हो गई है। बशीर बद्र, जो बेहद सुरीले शायर थे, हमेशा के लिए हमारी महफिल से रुखसत हो गए। यह शायर और इनकी शायरी हमारी यादों में हमेशा ज़िंदा रहेगी।"
बद्र की गज़लें, मीर तकी मीर की गज़लों की तरह ही, बेहद समकालीन उर्दू में लिखी होती थीं और लोग उन्हें आसानी से समझकर सराहते थे। उनकी कुछ बेहतरीन रचनाएं दर्द भरे प्यार की अभिव्यक्ति थीं और उनमें जीवन के रहस्यों को भी बयां किया गया था।
15 फरवरी, 1935 को अयोध्या (उत्तर प्रदेश) में जन्मे बद्र उर्दू ज़बान पर अपनी महारत, खासकर गज़लों के क्षेत्र में, के लिए मशहूर थे। इसके अलावा, उन्हें फ़ारसी, हिंदी और अंग्रेज़ी का भी अच्छा ज्ञान था। 69 गज़लों का पुरस्कार-विजेता संग्रह 'आस', बद्र की काव्य-यात्रा का एक अनमोल रत्न माना जाता है। उनके संग्रहों में से एक, जिसका शीर्षक 'कुलियाते बशीर बद्र' है, पाकिस्तान में प्रकाशित हुआ है। बद्र को समर्पित एक वेबसाइट के अनुसार, माना जाता है कि उन्होंने बहुत कम उम्र में, 7 साल की उम्र से ही कविताएँ लिखना शुरू कर दिया था। वे अपनी कई रचनाओं में उर्दू की कोमल भावनाओं को अंग्रेजी की शैली में ढालने वाले पहले कवियों में से एक थे।
उन्होंने उर्दू में कविताओं के सात से अधिक संग्रह और हिंदी में एक संग्रह प्रकाशित किया। उनके नाम कई ग़ज़ल संग्रह हैं - 'इकाई', 'इमेज', 'आमद', 'आहट', 'कुलियाते बशीर बद्र'। बद्र ने साहित्यिक आलोचना पर दो किताबें भी लिखीं - 'आज़ादी के बाद उर्दू ग़ज़लों का तनक़ीदी मुताला' और 'बीसवीं सदी में ग़ज़ल'। उन्होंने देवनागरी लिपि में उर्दू ग़ज़लों का एक संग्रह भी प्रकाशित किया, जिसका शीर्षक था 'उजाले अपनी यादों के'। उनकी रचनाएँ गुजराती में भी प्रकाशित हुई हैं और अंग्रेजी तथा फ्रेंच में उनका अनुवाद किया गया है। पद्म श्री के अलावा, बद्र को यूपी उर्दू अकादमी द्वारा चार बार और बिहार उर्दू अकादमी द्वारा एक बार सम्मानित किया गया। उन्हें 'मीर अकादमी पुरस्कार' से भी नवाज़ा गया और कई अन्य सम्मान भी प्राप्त हुए।
बद्र का जीवन सफ़र आसान नहीं था। अप्रैल 1987 में सांप्रदायिक हिंसा के दौरान मेरठ में उनका घर जला दिया गया था, जिससे उनकी अधिकांश अप्रकाशित रचनाएं नष्ट हो गईं। लेकिन उन्होंने फिर से नए सिरे से शुरुआत की और भोपाल चले गए। वेबसाइट के अनुसार, इस घटना और जीवन की अन्य चुनौतियों ने मिलकर उनकी कई रचनाओं में एक गहरी करुणा भर दी।
उनकी रचनाओं की व्यापक लोकप्रियता के कारण उन्हें दुनिया भर के कई स्थानों की यात्रा करनी पड़ी, जिनमें अमेरिका, दुबई, कतर और पाकिस्तान शामिल हैं। बद्र अपने पीछे अपनी पत्नी और दो बच्चों को छोड़ गए हैं। उनके एक रिश्तेदार ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार शाम को किया जाएगा।