सिंधिया समर्थक BJP नेता का अचानक इस्तीफा, जिला अध्यक्ष पर फोड़ा ठीकरा, बोले- पार्टी में हो रही अनदेखी

Edited By Himansh sharma, Updated: 13 May, 2026 11:50 AM

scindia supporter quits bjp levels serious allegations

मध्यप्रदेश भाजपा में इन दिनों एक तरफ संगठनात्मक नियुक्तियों और राजनीतिक संतुलन साधने की कवायद चल रही है

भोपाल: मध्यप्रदेश भाजपा में इन दिनों एक तरफ संगठनात्मक नियुक्तियों और राजनीतिक संतुलन साधने की कवायद चल रही है, तो दूसरी तरफ पार्टी के भीतर बढ़ती नाराजगी अब खुलकर सामने आने लगी है। ग्वालियर से भाजपा नेता, पूर्व पार्षद और खुद को ज्योतिरादित्य सिंधिया का समर्थक बताने वाले देवेंद्र पाठक का पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देना सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भाजपा के भीतर उभर रहे उस असंतोष के संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जो लंबे समय से दबा हुआ था।

देवेंद्र पाठक ने मीडिया से बातचीत में जिस तरह खुलकर जिला नेतृत्व पर सवाल खड़े किए, उसने संगठन की कार्यप्रणाली पर भी बहस छेड़ दी है। पाठक का आरोप है कि उन्होंने क्षेत्र की जनता और गरीबों के मुद्दों को लेकर लगातार आवाज उठाई, लेकिन जिला नेतृत्व ने उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने सीधे तौर पर जिला भाजपा अध्यक्ष जयप्रकाश राजोरिया के रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि कई बार आग्रह करने के बावजूद संगठन ने जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की।

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सबसे दिलचस्प बात यह रही कि इस्तीफे के बावजूद देवेंद्र पाठक ने सिंधिया के प्रति अपनी निष्ठा दोहराई। उनका यह बयान कि “पार्टी छोड़ सकता हूं, लेकिन सिंधिया जी का साथ नहीं छोड़ूंगा राजनीतिक गलियारों में कई संकेत छोड़ गया। इससे साफ है कि भाजपा के भीतर एक ऐसा वर्ग मौजूद है, जिसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता संगठन से ज्यादा सिंधिया के साथ जुड़ी हुई मानी जाती है।

दरअसल, 2020 में कांग्रेस छोड़कर ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भाजपा में आए नेताओं और कार्यकर्ताओं को लेकर शुरू से ही यह चर्चा रही कि उन्हें संगठन और सत्ता में किस स्तर तक समायोजित किया जाएगा। शुरुआती दौर में कई नेताओं को जिम्मेदारियां और पद मिले भी, लेकिन समय बीतने के साथ बड़ी संख्या में ऐसे कार्यकर्ता और नेता सामने आने लगे, जो खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। ग्वालियर-चंबल अंचल में यह भावना ज्यादा दिखाई दे रही है, जहां सिंधिया समर्थकों की मजबूत पकड़ मानी जाती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि देवेंद्र पाठक का इस्तीफा सिर्फ एक व्यक्ति की नाराजगी नहीं, बल्कि उस अंदरूनी बेचैनी की झलक है जो धीरे-धीरे सतह पर आने लगी है। भाजपा के भीतर कई ऐसे नेता हैं जो लंबे समय से संगठन या सरकार में किसी बड़ी जिम्मेदारी की उम्मीद लगाए बैठे हैं। लेकिन नियुक्तियों में अपेक्षित स्थान न मिलने और पुराने भाजपा नेताओं के दबदबे के चलते उनमें असंतोष बढ़ रहा है।

PunjabKesariअब बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या आने वाले समय में ऐसे और चेहरे सामने आ सकते हैं? क्या जो नेता वर्षों से “उपकृत” होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वे भी खुद को नजरअंदाज महसूस होने पर भाजपा से दूरी बना सकते हैं? फिलहाल पार्टी नेतृत्व इस तरह की घटनाओं को व्यक्तिगत नाराजगी बताकर सीमित दिखाने की कोशिश करेगा, लेकिन राजनीतिक तौर पर यह संकेत हल्के नहीं माने जा रहे।

विशेषकर तब, जब प्रदेश भाजपा में संगठनात्मक नियुक्तियों का दौर जारी है और कई नेता अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर इंतजार की स्थिति में हैं। ऐसे समय में यदि सिंधिया समर्थक खेमे से लगातार असंतोष की खबरें सामने आती हैं, तो यह भाजपा के लिए केवल संगठनात्मक नहीं बल्कि राजनीतिक संतुलन का भी बड़ा विषय बन सकता है।

ग्वालियर-चंबल की राजनीति हमेशा से व्यक्तित्व आधारित रही है और यहां नेताओं की व्यक्तिगत पकड़ कई बार संगठन से ज्यादा प्रभावशाली मानी जाती है। ऐसे में देवेंद्र पाठक जैसे नेताओं का खुलकर सामने आना आने वाले दिनों में भाजपा की अंदरूनी राजनीति को और दिलचस्प बना सकता है।

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