क्या BJP में सिंधिया समर्थकों की ‘प्रतीक्षा’ अब थकान में बदल रही है? इस्तीफों, नोटिस और अनदेखी ने बढ़ाई सियासी बेचैनी

Edited By Himansh sharma, Updated: 13 May, 2026 04:51 PM

are scindia supporters feeling ignored in bjp

मध्यप्रदेश भाजपा में इन दिनों सिर्फ नियुक्तियों की चर्चा नहीं है, बल्कि संगठन के भीतर पनप रही एक खामोश बेचैनी भी राजनीतिक गलियारों में तेजी से महसूस की जा रही है।

भोपाल: मध्यप्रदेश भाजपा में इन दिनों सिर्फ नियुक्तियों की चर्चा नहीं है, बल्कि संगठन के भीतर पनप रही एक खामोश बेचैनी भी राजनीतिक गलियारों में तेजी से महसूस की जा रही है। खासकर ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल अब खुलकर उठने लगा है कि क्या पार्टी में उनकी भूमिका सिर्फ सत्ता परिवर्तन तक सीमित होकर रह गई है?साल 2020 में जब सिंधिया समर्थक विधायकों और नेताओं ने कांग्रेस से बगावत कर भाजपा का दामन थामा था, तब इसे भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक जीत माना गया था। सत्ता परिवर्तन हुआ, सरकार बनी और सिंधिया खेमे को तत्काल राजनीतिक महत्व भी मिला। लेकिन समय बीतने के साथ अब वही समर्थक खुद को संगठन और सत्ता की मुख्यधारा से दूर महसूस कर रहे हैं।

पूर्व मंत्री इमरती देवी, मुन्नालाल गोयल, गिरराज दंडोतिया, महेंद्र सिंह सिसोदिया जैसे कई चेहरे आज भी किसी बड़ी जिम्मेदारी की प्रतीक्षा में हैं। निगम-मंडलों और संगठनात्मक नियुक्तियों का दौर जारी है, लेकिन सिंधिया खेमे के कई नेताओं को अब तक अपेक्षित स्थान नहीं मिला। इतना ही नहीं, सिंधिया समर्थक माने जाने वाले प्रभुराम चौधरी को भी इस बार मंत्रीमंडल में जगह नहीं दी गई, जिसने इस असंतोष को और गहरा कर दिया।

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि भाजपा के भीतर दो स्तर पर असहजता दिखाई दे रही है। पहला, पुराने भाजपाई नेताओं और नए आए सिंधिया समर्थकों के बीच सामंजस्य की चुनौती। दूसरा, सिंधिया खेमे की बढ़ती अपेक्षाएं, जिन्हें अब तक पूरी तरह संतुष्ट नहीं किया जा सका है। यही वजह है कि अब नाराजगी कभी सोशल मीडिया पोस्ट के रूप में सामने आ रही है तो कभी इस्तीफों के जरिए।

हाल ही में सिंधिया समर्थक कृष्णा घाड़गे का मामला इसी अंदरूनी तनाव का ताजा उदाहरण माना जा रहा है। सोशल मीडिया पर की गई एक विवादित पोस्ट के बाद भाजपा संगठन ने उनके खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। घाड़गे ने अपनी फेसबुक पोस्ट में “बालक बुद्धि नेता” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। राजनीतिक हलकों में इसे गुना के पूर्व सांसद के.पी. यादव की ओर इशारा माना गया, जिन्होंने लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया को हराया था।

भाजपा ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि पार्टी अनुशासन से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा। लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह कार्रवाई सिर्फ अनुशासन बनाए रखने के लिए थी या फिर संगठन के भीतर बढ़ती असहमति को नियंत्रित करने की कोशिश भी?

इसी बीच ग्वालियर से भाजपा नेता और खुद को सिंधिया समर्थक बताने वाले पूर्व पार्षद देवेंद्र पाठक का इस्तीफा भी राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पाठक ने सिर्फ पार्टी छोड़ी नहीं, बल्कि खुलकर जिला नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर सवाल भी खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि जमीनी कार्यकर्ताओं की लगातार उपेक्षा हो रही है और क्षेत्रीय समस्याओं को संगठन गंभीरता से नहीं सुन रहा।

देवेंद्र पाठक का इस्तीफा इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यह ऐसे समय आया है जब भाजपा संगठन विस्तार और नियुक्तियों के जरिए संतुलन साधने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर सिंधिया समर्थकों की नाराजगी इसी तरह सतह पर आती रही, तो आने वाले समय में यह भाजपा के लिए आंतरिक चुनौती बन सकती है।

हालांकि भाजपा नेतृत्व सार्वजनिक तौर पर किसी भी प्रकार के मतभेद से इनकार करता रहा है। पार्टी का कहना है कि संगठन में सभी कार्यकर्ताओं को सम्मान और अवसर मिलते हैं। लेकिन लगातार सामने आ रही घटनाएं यह संकेत जरूर दे रही हैं कि सिंधिया खेमे के भीतर अब “प्रतीक्षा” की राजनीति थकान में बदलती दिखाई दे रही है।

सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि क्या भाजपा आने वाले समय में सिंधिया समर्थकों को संगठन और सत्ता में बड़ी भूमिका देकर यह असंतोष शांत करेगी, या फिर यह नाराजगी धीरे-धीरे और बड़े राजनीतिक संकेतों में बदलती जाएगी।

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