Edited By Himansh sharma, Updated: 07 Sep, 2026 05:41 PM

भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन में आज भादौ महीने की अंतिम राजसी सवारी निकल रही है।
उज्जैन। भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन में आज भादौ महीने की अंतिम राजसी सवारी निकल रही है। सवारी को लेकर शहर में भक्तों का सैलाब उमड़ा हुआ है और सुरक्षा के भी कड़े इंतजाम किए गए हैं। इस ऐतिहासिक सवारी में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी शामिल हो रहे हैं। सिंधिया परिवार के लिए यह सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि करीब ढाई सौ साल पुरानी परंपरा से जुड़ा अवसर है। सवारी के दौरान सिंधिया महाकाल को राजपरिवार की ओर से पगड़ी अर्पित करेंगे। लेकिन इस पूरी परंपरा से जुड़ी एक बात ऐसी है, जो अक्सर लोगों की उत्सुकता बढ़ाती है. आखिर सिंधिया परिवार का कोई सदस्य उज्जैन में रात क्यों नहीं रुकता?
महाकाल की नगरी में 'एक ही महाराज' की मान्यता
ज्योतिरादित्य सिंधिया पहले भी इस परंपरा के पीछे की वजह बता चुके हैं। उनके अनुसार, जब उनके पूर्वज महाराष्ट्र से निकलकर मालवा की ओर आए तो उज्जैन को अपनी पहली राजधानी बनाया गया था। उसी दौरान यह मान्यता बनी कि उज्जैन के वास्तविक और सर्वोच्च महाराज भगवान महाकाल ही हैं। इसी विश्वास के चलते सिंधिया राजपरिवार ने उज्जैन में रात्रि विश्राम नहीं करने की परंपरा कायम रखी। खास बात यह है कि राजशाही समाप्त होने के बाद भी परिवार ने इस परंपरा को नहीं छोड़ा।
महाकाल की सवारी और सिंधिया परिवार का पुराना रिश्ता
श्रावण और भादौ के दौरान निकलने वाली महाकाल की सवारियों का धार्मिक महत्व बेहद खास माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान भगवान महाकाल अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं। सिंधिया परिवार का भी महाकाल मंदिर और उज्जैन की धार्मिक परंपराओं से पुराना संबंध रहा है। राजपरिवार के सदस्य लंबे समय से महाकाल की पूजा और सवारी से जुड़ी परंपराओं में भाग लेते रहे हैं। आज की राजसी सवारी में भी ज्योतिरादित्य सिंधिया इसी परंपरा को आगे बढ़ाते नजर आएंगे।
उज्जैन में मंदिर के पुनर्निर्माण से भी जुड़ा है सिंधिया परिवार
इतिहास के पन्नों में भी महाकाल मंदिर और सिंधिया परिवार का संबंध दर्ज मिलता है। पुराने समय में मंदिर को नुकसान पहुंचाए जाने के बाद लंबे समय तक इसका स्वरूप बदलता रहा।बाद में मराठा काल में सिंधिया परिवार के शासन के दौरान महाकाल मंदिर के पुनर्निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हुआ। बताया जाता है कि रानोजी सिंधिया उज्जैन पहुंचे तो मंदिर की स्थिति देखकर बेहद व्यथित हुए और उन्होंने इसके पुनर्निर्माण का आदेश दिया। यही वजह है कि सिंधिया परिवार की महाकाल से जुड़ी आस्था केवल एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं मानी जाती, बल्कि इसका संबंध उज्जैन के इतिहास से भी जोड़ा जाता है।
रात होने से पहले शहर की सीमा से बाहर चले जाते हैं
सिंधिया परिवार के लिए उज्जैन में रात्रि विश्राम न करने की परंपरा आज भी जारी है। ज्योतिरादित्य सिंधिया जब उज्जैन आते हैं तो आमतौर पर रात शहर में नहीं बिताते।बताया जाता है कि शहर की सीमा के बाहर सिंधिया परिवार का पुश्तैनी निवास है, जहां परिवार के सदस्य ठहरते हैं। यानी उज्जैन की सीमा के भीतर रात न गुजारने की परंपरा को आज भी उसी तरह निभाया जा रहा है।