Edited By Vandana Khosla, Updated: 06 May, 2026 05:10 PM

भोपाल: मध्यप्रदेश की राजनीति में एक दिलचस्प बदलाव चुपचाप आकार ले रहा है। जिस संगठनात्मक पद को कभी कार्यकर्ता लेने से कतराते थे, आज वही पद सत्ता और प्रभाव का प्रतीक बन गया है। भारतीय जनता पार्टी (भारतीय जनता पार्टी) के पिछड़ा वर्ग मोर्चा में इन...
भोपाल: मध्यप्रदेश की राजनीति में एक दिलचस्प बदलाव चुपचाप आकार ले रहा है। जिस संगठनात्मक पद को कभी कार्यकर्ता लेने से कतराते थे, आज वही पद सत्ता और प्रभाव का प्रतीक बन गया है। भारतीय जनता पार्टी (भारतीय जनता पार्टी) के पिछड़ा वर्ग मोर्चा में इन दिनों पदाधिकारी बनने को लेकर जिस तरह की होड़ मची है, वह न केवल संगठन की बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाती है, बल्कि आगामी राजनीतिक समीकरणों की आहट भी दे रही है।
यहां कुछ साल पहले तक स्थिति बिल्कुल उलट थी। पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ में जिम्मेदारी लेने के लिए कार्यकर्ताओं को मनाना पड़ता था। लेकिन जैसे-जैसे सामाजिक समीकरणों में पिछड़ा वर्ग की भूमिका निर्णायक होती गई, संगठन ने इसे मोर्चे का दर्जा देकर उसकी राजनीतिक अहमियत बढ़ा दी। यही वजह है कि अब इस मोर्चे का अध्यक्ष पद केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यही बढ़ती अहमियत अब अंदरूनी खींचतान का कारण बन गई है। गोलू शुक्ला और जीतू जिराती जैसे नेता, जो आपसी तालमेल के लिए जाने जाते हैं, इस मुद्दे पर अलग-अलग खेमों में नजर आ रहे हैं। एक तरफ अपने समर्थक संजय कौशिक को आगे बढ़ाने की कोशिश है, तो दूसरी ओर निलेश चौधरी के नाम को लेकर जोर लगाया जा रहा है। दिलचस्प यह है कि यह प्रतिस्पर्धा टकराव से ज्यादा ‘प्रभाव स्थापित करने’ की लड़ाई बनती दिख रही है।
इस पूरे घटनाक्रम में स्थानीय संगठन की भूमिका भी कम अहम नहीं है। नगर अध्यक्ष सुमित मिश्रा द्वारा कोर कमेटी से नाम मंगाने की प्रक्रिया ने इस प्रतिस्पर्धा को औपचारिक रूप दे दिया है। अब यह केवल दावेदारी नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का मंच बन चुका है। दूसरी ओर, पुराने और जमीनी कार्यकर्ता भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। मौजूदा अध्यक्ष रघु यादव फिर से अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं, वहीं जीतू कुशवाह जैसे नेता अपनी सक्रियता को आधार बनाकर शीर्ष पद की ओर देख रहे हैं। यह संकेत है कि संगठन के भीतर अनुभव और नई महत्वाकांक्षा के बीच संतुलन साधना आसान नहीं होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस बदलाव के पीछे एक बड़ा कारण कांग्रेस द्वारा पिछड़ा वर्ग की राजनीति को हवा देना भी है। इससे भाजपा ने भी इस वर्ग को लेकर अपनी रणनीति और अधिक आक्रामक बना दी है। परिणामस्वरूप, संगठन के भीतर अब यह मोर्चा ‘साधारण जिम्मेदारी’ से ‘राजनीतिक लॉन्चपैड’ में बदल चुका है।
यह पूरा घटनाक्रम एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है— राजनीति में अब पद केवल काम करने का माध्यम नहीं, बल्कि प्रभाव, पहचान और भविष्य की राजनीति की सीढ़ी बन चुके हैं। भाजपा के भीतर मची यह होड़ उसी बदलते दौर का प्रतिबिंब है, जहां संगठनात्मक नियुक्तियां भी सियासी रणनीति का अहम हिस्सा बन गई हैं।