Edited By Himansh sharma, Updated: 10 Jan, 2026 11:31 AM

छुईखदान की धरती पर कल शाम सिर्फ दीये नहीं जले, बल्कि वर्षों से दबा आक्रोश भी आंदोलन की लौ बनकर सामने आया।
खैरागढ़। (हेमंत पाल): छुईखदान की धरती पर कल शाम सिर्फ दीये नहीं जले, बल्कि वर्षों से दबा आक्रोश भी आंदोलन की लौ बनकर सामने आया। 1953 के ऐतिहासिक गोलीकांड की पुण्यतिथि पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने उमड़ी भीड़ ने यह साफ कर दिया कि यह आयोजन केवल अतीत को याद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य की बड़ी लड़ाई का ऐलान है। हजारों दीपकों की रोशनी के बीच छुईखदान से एक मजबूत और साफ आवाज उठी कि जिले के नाम से भले ही छुईखदान हटा दिया जाए, लेकिन छुईखदान को विधानसभा का दर्जा हर हाल में मिलना चाहिए।
इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि मंच पर राजनीति नहीं, बल्कि पीड़ा और अधिकार बोलते नजर आए। भाजपा और कांग्रेस सहित विभिन्न दलों के कार्यकर्ता और आम नागरिक बिना किसी दलगत पहचान के एक ही मंच पर एक ही मांग को लेकर खड़े दिखाई दिए। किसी ने पार्टी का झंडा नहीं उठाया, केवल छुईखदान के हक की बात हुई। यही कारण रहा कि श्रद्धांजलि का यह कार्यक्रम धीरे धीरे एक जन आंदोलन का रूप लेता दिखाई दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि खैरागढ़ छुईखदान और गंडई को मिलाकर जिला बनाना भले ही राजनीतिक रूप से बड़ी उपलब्धि रहा हो, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है।
जिला बनने के बाद भी छुईखदान और गंडई की स्थिति में कोई ठोस बदलाव नहीं आया। बड़े कार्यालय अधिकारी संसाधन और प्रशासनिक फैसले आज भी खैरागढ़ में ही सिमटे हुए हैं, जबकि शेष दोनों क्षेत्र खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि जिला बनने से पहले जैसी परिस्थितियां थीं, हालात आज भी लगभग वैसे ही बने हुए हैं।
यह भी सच्चाई है कि खैरागढ़ छुईखदान और गंडई तीन अलग अलग भौगोलिक और सामाजिक इकाइयां हैं। खैरागढ़ से छुईखदान की दूरी करीब पंद्रह किलोमीटर है, जबकि गंडई उससे भी अधिक दूर स्थित है। ऐसे में तीनों को एक ही प्रशासनिक ढांचे में बांधना शुरू से ही अव्यवहारिक माना गया। प्रशासन तक पहुंच कठिन है और विकास की गति बेहद धीमी है।
इसी नाराजगी ने अब एक सीधी और साफ मांग का रूप ले लिया है। छुईखदान के लोग कह रहे हैं कि जिले के नाम में उनका नाम भले ही न रहे, लेकिन उनकी पहचान और आवाज खत्म न की जाए। विधानसभा का दर्जा मिलने से ही क्षेत्र की समस्याएं सीधे सदन तक पहुंचेंगी और यही छुईखदान की सबसे बड़ी आवश्यकता है। 1953 में अधिकारों के लिए शहादत देने वाले शहीदों की स्मृति में जले दीपकों ने आज नई पीढ़ी को संघर्ष के लिए खड़ा कर दिया है।
मंच से संदेश साफ था कि यह लड़ाई किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था की अनदेखी के खिलाफ है। छुईखदान अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट होने को तैयार नहीं है। यदि अब भी उसकी आवाज नहीं सुनी गई, तो यह शांत रोशनी जल्द ही एक तेज और व्यापक आंदोलन में बदल सकती है।