ओवैसी के ‘हिजाब वाली प्रधानमंत्री’ पर MP में सियासत, IAS नियाज खान की पोस्ट से छिड़ी नई बहस

Edited By meena, Updated: 14 Jan, 2026 05:13 PM

politics erupts in madhya pradesh over owaisi s hijab wearing prime minister r

एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी के “हिजाब पहनने वाली महिला प्रधानमंत्री” वाले बयान ने अब मध्य प्रदेश में भी सियासी हलचल पैदा कर दी है। इस मुद्दे को तब और तूल मिल गया

भोपाल : एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी के “हिजाब पहनने वाली महिला प्रधानमंत्री” वाले बयान ने अब मध्य प्रदेश में भी सियासी हलचल पैदा कर दी है। इस मुद्दे को तब और तूल मिल गया, जब मध्य प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी नियाज खान ने ओवैसी के बयान का खुलकर समर्थन कर दिया। आईएएस अधिकारी नियाज खान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा—“भारत सेकुलर देश है। यहां हिजाब वाली देशभक्त मुस्लिम प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकती? भारत ने हमेशा देशभक्त और काबिल मुस्लिमों को सम्मान दिया है। मैं ओवैसी जी से सहमत हूं।”

इतना ही नहीं, उन्होंने देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का उदाहरण देते हुए कहा—“भारत ने हमेशा मुस्लिमों के प्रति सहिष्णुता दिखाई है। हिंदुओं ने ही अब्दुल कलाम साहब को आसमान में बैठाया है।”

आईएएस अधिकारी की इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई है। एक वर्ग इसे संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता और समान अधिकारों की बात बता रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे एक सिविल सर्वेंट द्वारा राजनीतिक बयानबाज़ी करार दे रहा है। कुछ यूजर्स ने सवाल उठाए हैं कि क्या एक सेवारत आईएएस अधिकारी को इस तरह सार्वजनिक रूप से राजनीतिक बयान देना चाहिए, वहीं समर्थकों का कहना है कि यह संविधान की भावना के समर्थन में दिया गया विचार है, न कि किसी दल विशेष के लिए।

नियाज खान के बयान के बाद मध्य प्रदेश की राजनीति में भी हलचल तेज हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला अब सिर्फ ओवैसी के बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता बनाम व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की बहस में बदल गया है। भाजपा और कांग्रेस की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक यह मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीतिक बयानबाज़ी का बड़ा विषय बन सकता है।

संवैधानिक बनाम प्रशासनिक सवाल

यह पूरा विवाद एक अहम सवाल खड़ा करता है— क्या एक लोकतांत्रिक और सेकुलर देश में किसी की धार्मिक पहचान उसके सर्वोच्च पद तक पहुंचने में बाधा बन सकती है? और साथ ही—क्या सेवारत प्रशासनिक अधिकारियों को ऐसे संवेदनशील राजनीतिक मुद्दों पर सार्वजनिक टिप्पणी करनी चाहिए? बता दें कि ओवैसी ने एक रैली में कहा था कि- मेरा सपना है कि हिजाब वाली कोई बेटी देश की प्रधानमंत्री बने।

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