कांस्टेबल की मां की पेंशन रोकने पर हाईकोर्ट ने सरकार को लगाई फटकार, 6 सप्ताह का दिया समय

Edited By meena, Updated: 14 Feb, 2026 05:21 PM

the high court reprimanded the government for withholding the pension of the con

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने नक्सली हमले में जान गंवाने वाले पुलिस कांस्टेबल इग्नाटियस लाकड़ा की 68 वर्षीय मां को पारिवारिक पेंशन से इनकार करने को ''अत्यधिक अन्यायपूर्ण'' करार देते हुए राज्य सरकार को...

रायपुर : छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने नक्सली हमले में जान गंवाने वाले पुलिस कांस्टेबल इग्नाटियस लाकड़ा की 68 वर्षीय मां को पारिवारिक पेंशन से इनकार करने को ''अत्यधिक अन्यायपूर्ण'' करार देते हुए राज्य सरकार को छह सप्ताह के भीतर इस मामले में फैसला करने का निर्देश दिया। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने फिलिसिता लाकड़ा (68) द्वारा दायर याचिका पर 11 फरवरी को यह आदेश पारित किया। उनका बेटा इग्नाटियस लाकड़ा सूरजपुर जिले में छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल (सीएएफ) की 10वीं बटालियन में कार्यरत थे और 2002 में माओवादियों के साथ मुठभेड़ में उनकी जान चली गई थी। उस समय इग्नाटियस की उम्र 21 साल थी। इग्नाटियस की नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में जान जाने के बाद उनके पिता लोबिन को पारिवारिक पेंशन मिल रही थी। हालांकि, अगस्त 2020 में लोबिन के निधन के बाद, जशपुर जिले के कोषगार ने पेंशन रोक दी। फिलिसिता ने सीएएफ की 10वीं बटालियन के कमांडेंट तथा जशपुर और अंबिकापुर (सरगुजा) के कोषागार अधिकारियों से पेंशन बहाल करने की गुहार लगाई लेकिन राहत नहीं मिलने पर 2021 में उच्च न्यायालय का रुख किया। उच्च न्यायालय ने अक्टूबर 2021 में अधिकारियों को अधिमानत: 60 दिनों के भीतर मामले का निस्तारण करने का निर्देश दिया। हालांकि, 10वीं बटालियन के कमांडेंट ने सूचित किया कि छत्तीसगढ़ पुलिस कर्मचारी वर्ग साधारण परिवार निवृत्ति वेतन नियम 1965 के तहत मूल पेंशनभोगी की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी को पारिवारिक पेंशन देने का कोई प्रावधान नहीं है।

वित्त विभाग के तहत कोष, लेखा और पेंशन निदेशालय ने बाद में फिलिसिता लाकड़ा को पारिवारिक पेंशन के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। महिला के वकील आशीष बेक ने दलील दी कि 1965 के नियम भेदभावपूर्ण थे क्योंकि छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (असाधारण पेंशन) नियम, 1963 में प्रावधान है कि मृत कर्मचारी के पिता को स्वीकृत पेंशन, उनकी मृत्यु के बाद, मां को देय होगी। उन्होंने कहा कि 1965 के नियम 1963 के नियमों की तरह होना चाहिए, लेकिन मृत कर्मचारी की मां (पिता की मृत्यु के बाद) को मिलने वाली पारिवारिक पेंशन के संबंध में 1965 के नियम मनमाने, अनुचित और भेदभावपूर्ण हैं।

याचिका का विरोध करते हुए, उप महाधिवक्ता प्रसून कुमार भादुड़ी ने दलील दी कि 1963 के नियम सामान्य प्रकृति के थे, जबकि 1965 के नियम एक विशिष्ट श्रेणी के पुलिस कर्मियों के लिए लागू विशेष प्रावधान थे, और सामान्य नियमों के मुकाबले विशेष नियमों को तरजीह दी जाती है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पीठ ने फैसला दिया, ''हमें यह मानने में कोई झिझक नहीं है कि 1965 के अधिनियम में भी 1963 के नियमों के समान प्रावधान होने चाहिए, जिसे 1970 में संशोधन द्वारा लाया गया था ताकि पेंशनभोगी पिता की मृत्यु के बाद मृत कर्मचारी की मां को पेंशन का लाभ प्रदान किया जा सके।''

अदालत ने कहा, मृत कर्मचारी की मां को पेंशन देने से इनकार करना बेहद अन्यायपूर्ण है, खासकर तब जब वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता के बेटे की नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में जान गई।'' अदालत ने कहा, "हम इस याचिका का निपटारा इस टिप्पणी के साथ करते हैं कि 1963 के नियमों में दिनांक 30.11.1970 की अधिसूचना के माध्यम से संशोधन कर जोड़े गए 'नोट 6' को 1965 के नियमों के एक भाग के रूप में भी पढ़ा जाएगा और 1965 के नियमों के तहत पिता को स्वीकृत 15वीं पेंशन, उनकी मृत्यु के बाद, मां को देय होगी।"

इसमें कहा गया है कि इस प्रकार, याचिकाकर्ता पेंशन का हकदार होगा। उच्च न्यायालय के फैसले में कहा, ''प्रतिवादी अधिकारियों को छह सप्ताह की अवधि के भीतर इस याचिका में की गई टिप्पणियों के आलोक में याचिकाकर्ता के मामले पर विचार करने और निर्णय लेने का निर्देश दिया जाता है।'' 

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