MP में बागेश्वर बाबा को टक्कर दे रहा 16 साल का नया बाबा! चेहरा देखकर भूत-भविष्य बताने का दावा

Edited By Himansh sharma, Updated: 27 Apr, 2026 12:48 PM

16 year old baba challenges bageshwar baba with miracle claims

मध्य प्रदेश के छतरपुर के केड़ी गांव में इन दिनों एक 16 वर्षीय कथित बाबा की चर्चा जोरों पर है।

छतरपुर: मध्य प्रदेश के छतरपुर के केड़ी गांव में इन दिनों एक 16 वर्षीय कथित बाबा की चर्चा जोरों पर है। खुद को ‘अजय पार बाबा’ कहलाने वाले करण कुशवाहा का दावा है कि वे कैंसर से लेकर लकवा जैसी गंभीर बीमारियों तक को ठीक कर सकते हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे इस दरबार ने लोगों की उत्सुकता बढ़ा दी है, वहीं कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। करण कुशवाहा, जो खुद केवल नौवीं तक पढ़े हैं, बताते हैं कि वे पहले इसी स्थान पर नारियल बेचने का काम करते थे और कुछ समय तक ई-रिक्शा भी चलाते थे। छतरपुर जिले के केड़ी गांव स्थित चंदेलकालीन पहाड़ियों के पास अजय पार बाबा की समाधि स्थल पहले से ही आस्था का केंद्र रही है। इसी स्थान पर पिछले ढाई वर्षों से करण ने अपना दरबार लगाना शुरू किया।

हालांकि, पिछले दो महीनों में सोशल मीडिया पर प्रचार बढ़ने के बाद यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने लगी। बाबा बिना पर्ची देखे लोगों का भूत-भविष्य बताने और गंभीर बीमारियों को ठीक करने का दावा करते हैं। उनका कहना है कि वे केवल ‘अजय पार बाबा’ का नाम लेकर रोगियों को राहत दिलाते हैं। एक इंटरव्यू के दौरान जब उनसे पूछा गया कि यदि वे भविष्य देख सकते हैं तो अपना भविष्य क्या है, तो वे स्पष्ट जवाब नहीं दे सके। वहीं उन्होंने यह भी कहा कि उनका भविष्य का लक्ष्य बाबा बनकर दरबार लगाना ही है। उन्होंने दावा किया कि दिल्ली से आए एक कैंसर मरीज को उन्होंने दो-तीन दिन में ठीक कर दिया था, जिसके बाद उनकी प्रसिद्धि बढ़ती चली गई।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर और लकवा जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज केवल चिकित्सकीय परामर्श और वैज्ञानिक पद्धति से ही संभव है। ऐसे दावों पर आंख मूंदकर भरोसा करना मरीजों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। बाबा स्वयं भी लोगों को डॉक्टर के पास जाने की सलाह देने की बात कहते हैं, लेकिन चमत्कारी इलाज के दावे कई बार लोगों को भ्रमित कर सकते हैं। छतरपुर का यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि आस्था और अंधविश्वास के बीच की रेखा आखिर कहां खींची जाए। श्रद्धा अपनी जगह है, लेकिन गंभीर बीमारियों के इलाज में वैज्ञानिक सोच और चिकित्सा व्यवस्था पर भरोसा ही सबसे सुरक्षित रास्ता माना जाता है।

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