Edited By meena, Updated: 14 Jan, 2026 07:01 PM

धमधा ब्लॉक की ग्राम पंचायत घोटवानी में सामने आया यह मामला अब केवल सीमांकन की एक तकनीकी त्रुटि नहीं रह गया है, बल्कि राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली, राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक निष्पक्षता...
धमधा (हेमंत पाल) : धमधा ब्लॉक की ग्राम पंचायत घोटवानी में सामने आया यह मामला अब केवल सीमांकन की एक तकनीकी त्रुटि नहीं रह गया है, बल्कि राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली, राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्नचिह्न बन चुका है। यह प्रकरण यह सोचने पर मजबूर करता है कि राजस्व रिकॉर्ड आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए हैं या फिर रसूखदारों को संरक्षण देने का औज़ार बन चुके हैं।
पुरखों की जमीन ढूंढने गया बेटा, हाथ में थमा दी गई सरकारी भूमि
घोटवानी निवासी स्वर्गीय लतमार निषाद के निधन के बाद उनके पुत्र ने अपनी लगभग पांच एकड़ से अधिक पैतृक भूमि के सीमांकन के लिए राजस्व विभाग में आवेदन प्रस्तुत किया।
मकसद पूरी तरह स्पष्ट था
पुरखों की जमीन को चिन्हित करना, दस्तावेज दुरुस्त कराना और अपने वैधानिक अधिकार को सुरक्षित करना। लेकिन सीमांकन की प्रक्रिया ने परिवार को हतप्रभ कर दिया। आरोप है कि पटवारी और राजस्व निरीक्षक (आरआई) ने निषाद परिवार की असली पैतृक भूमि को छुए बिना, सरकारी घास भूमि का सीमांकन कर उसे निषाद परिवार की जमीन घोषित कर दिया। जहां रसूखदार का कब्जा, वहां सीमांकन ‘अंधा’ निषाद परिवार का कहना है कि उनकी वास्तविक पैतृक भूमि खसरा नंबर 795, 796 और 801 में दर्ज है। बताया जा रहा है कि यह जमीन वर्तमान में एक प्रभावशाली राजनीतिक नेता के भाई के कब्जे में है।

स्थानीय लोगों का दावा है कि संबंधित व्यक्ति कांग्रेस से जुड़ा हुआ है। पूर्व मंत्रियों का करीबी माना जाता है। आरोप है कि इसी राजनीतिक रसूख के चलते राजस्व अमले ने उस जमीन की ओर देखने तक की हिम्मत नहीं की, जबकि करीब 5.30 एकड़ सरकारी भूमि को निजी बताकर सीमांकन कर दिया गया। जब पीड़ित खुद कह रहा “यह हमारी जमीन नहीं है”
इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि निषाद परिवार स्वयं इस सीमांकन को स्वीकार करने से इनकार कर रहा है। परिवार का स्पष्ट कहना है “यह जमीन हमारी पैतृक नहीं है। हमारी असली जमीन किसी रसूखदार के कब्जे में है। हमें जबरन सरकारी घास जमीन हमारी बताई जा रही है।” आमतौर पर लोग सरकारी जमीन हथियाने के आरोपों में घिरते हैं, लेकिन यहां स्थिति बिल्कुल उलट है
पीड़ित परिवार सरकारी जमीन लेने से मना कर रहा है और अपनी असली पैतृक जमीन की मांग कर रहा है। ग्रामीणों का दो टूक ऐलान“गांव की जमीन नहीं जाने देंगे”जिस भूमि का सीमांकन किया गया है, उसे ग्रामीण वर्षों से सरकारी घास भूमि बताते आ रहे हैं। इसी जमीन पर गांव के मवेशी चरते हैं और यह गांव की सामूहिक आवश्यकता से जुड़ी हुई है। ग्रामीणों का साफ कहना है “यह गांव की साझा संपत्ति है। इसे किसी व्यक्ति के नाम दर्ज नहीं होने देंगे। जिसकी जमीन है, वह अपनी असली जमीन ले।”
राजनीतिक दबाव या राजस्व अमले की मिलीभगत?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि राजनीतिक दबाव रसूखदारों से सेटिंग और राजस्व अमले की मिलीभगत के चलते यह पूरा सीमांकन पूर्व नियोजित तरीके से किया गया, ताकि प्रभावशाली नेता के भाई की जमीन सुरक्षित रहे और विवाद का बोझ एक कमजोर निषाद परिवार पर डाल दिया जाए।
आरआई की सफाई ने और बढ़ाया शक
मामले में व्यास नारायण पवर्ण, राजस्व निरीक्षक (आरआई) का बयान भी सवालों के घेरे में है। उन्होंने कहा 2018 में मिशन रिकॉर्ड में नाम चढ़ा है। जमीन घास भूमि है। कैसे चढ़ा, यह मुझे पता नहीं। मैंने वस्तु स्थिति के अनुसार सीमांकन कर रिपोर्ट दी है।” लेकिन यहीं से कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं जब जमीन सरकारी घास भूमि है, तो निजी सीमांकन कैसे किया गया? मिशन रिकॉर्ड में नाम चढ़ाने का आदेश किसने दिया? क्या बिना भौतिक सत्यापन के सिर्फ फाइलों के आधार पर रिपोर्ट तैयार कर दी गई?
तहसीलदार ने मानी गड़बड़ी, नई जांच टीम से दोबारा सीमांकन
मामले की गंभीरता को देखते हुए धमधा तहसीलदार मीना साहू ने भी माना कि मामला संदिग्ध है। उन्होंने कहा एक नई जांच टीम बनाकर दोबारा सीमांकन कराया जाएगा, जिसमें दो-दो आरआई और अन्य हल्कों के पटवारी शामिल रहेंगे।” सिस्टम को बेचैन करने वाले सवाल क्या पटवारी और आरआई ने जानबूझकर गलत सीमांकन किया? क्या राजनीतिक दबाव में सरकारी जमीन को निजी बताकर रिकॉर्ड गढ़े गए? निषाद परिवार की असली पैतृक जमीन पर कब्जा किसके संरक्षण में है? क्या दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होगी या मामला फिर फाइलों में दफन हो जाएगा?