Edited By meena, Updated: 23 Apr, 2026 02:33 PM

मध्य प्रदेश में आने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस तैयारियों में जुटी है। ऐसे में राज्यसभा की तीसरी सीट को लेकर पार्टी के भीतर जो हलचल चल रही है, वह सिर्फ एक उम्मीदवार तय करने का मामला नहीं...
भोपाल : मध्य प्रदेश में आने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस तैयारियों में जुटी है। ऐसे में राज्यसभा की तीसरी सीट को लेकर पार्टी के भीतर जो हलचल चल रही है, वह सिर्फ एक उम्मीदवार तय करने का मामला नहीं, बल्कि पार्टी की आंतरिक रणनीति, नेतृत्व संतुलन और भविष्य की दिशा से भी जुड़ा हुआ है।
तीसरी सीट पर क्यों बढ़ा जोखिम?
मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं। आंकड़ों के हिसाब से दो सीटें भाजपा के खाते में जाना लगभग तय माना जा रहा है, जबकि तीसरी सीट कांग्रेस के लिए चुनौती बन गई है। कांग्रेस के पास कागज़ पर 66 विधायक थे, लेकिन मुकेश मल्होत्रा, राजेंद्र भारती और निर्मला सप्रे जैसे कुछ विधायकों के वोटिंग अधिकार पर संकट चलते यह संख्या घटकर करीब 63 रह जाती है। जबकि जीत के लिए 58 वोट जरूरी हैं। भले ही गणित अभी भी कांग्रेस के पक्ष में दिखता है, लेकिन ऐसे में क्रॉस वोटिंग का डर कांग्रेस नेताओं को भीतर ही भीतर सता रहा है। या कहा जा सकता है कि थोड़ी सी क्रॉस वोटिंग या असंतोष पूरी बाज़ी पलट सकता है।
नेतृत्व की पसंद: अलग-अलग दावेदार
रही बात कांग्रेस में टिकट के दावदारों की तो सब नेताओं की इस मामले में राय और पसंद भी अलग अलग है। सबसे पहले बात करते हैं राहुल गांधी की, उनकी पहली पसंद मीनाक्षी नटराजन मानी जा रही हैं, जो संगठन में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। इसके बाद राज्य के दिग्गज नेताओं की बात करें तो दिग्विजय सिंह पीसी शर्मा को आगे बढ़ा रहे हैं, जो ब्राह्मण वोट बैंक को साधने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। वहीं, सबसे मजबूत नाम के तौर पर कमलनाथ सामने आ रहे हैं, जिन्हें “सेफ कैंडिडेट” माना जा रहा है। इसके अलावा सज्जन सिंह वर्मा, कमलेश्वर पटेल और बाला बच्चन जैसे नाम भी चर्चा में हैं।
कमलनाथ क्यों बन सकते हैं गेम-चेंजर?
मौजूदा परिस्थितियों की बात करें तो कांग्रेस किसी भी तरह का जोखिम लेने के मूड में नहीं दिख रही। ऐसे में पूर्व सीएम कमलनाथ को सबसे मजबूत चेहरा माना जा रहा है। उनको मैदान में उतारने के पीछे सबसे बड़ा कारण उनकी संगठन पर मजबूत पकड़ और विधायकों के साथ व्यक्तिगत समीकरण है। माना जा रहा है कि अगर वे उम्मीदवार बनते हैं, तो क्रॉस वोटिंग की संभावना लगभग खत्म हो सकती है। साथ ही, उनका नाम आने से पार्टी के अंदरूनी गुट भी एकजुट हो सकते हैं।
अंदरूनी खींचतान भी बड़ी चुनौती
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के बीच मतभेद पहले से चर्चा में हैं। इसके अलावा, दिग्विजय सिंह और सिंघार के बीच भी तालमेल बेहतर नहीं माना जाता। ऐसे में अगर उम्मीदवार चयन में संतुलन नहीं बैठा, तो इसका असर वोटिंग पर भी पड़ सकता है। हालांकि, हरियाणा में हुई क्रॉस वोटिंग जैसी घटनाओं को देखते हुए कांग्रेस सतर्क है और कोई भी जोखिम नहीं लेना चाहती।
भाजपा की रणनीति भी अहम
भाजपा की तरफ से भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। संभावना जताई जा रही है कि अगर कांग्रेस मजबूत उम्मीदवार उतारती है, तो भाजपा तीसरी सीट पर उम्मीदवार न उतारने का फैसला भी कर सकती है। ऐसे में कांग्रेस की ओर से उम्मीदवार का चयन यह तय करेगा कि पार्टी अंदरूनी मतभेदों को कितनी अच्छी तरह संभाल पाती है और चुनावी गणित को अपने पक्ष में रख पाती है या नहीं।