Edited By Desh Raj, Updated: 13 Jun, 2026 08:28 PM

मध्य प्रदेश के खंडवा के सुलगांव में विधवा आदिवासी महिला किसान की जमीन पर हाईटेंशन टावर निर्माण को लेकर छिड़ा आंदोलन आखिरकार प्रशासन को झुकाने में कामयाब रहा।
खंडवा (मुश्ताक मंसूरी):मध्य प्रदेश के खंडवा के सुलगांव में विधवा आदिवासी महिला किसान की जमीन पर हाईटेंशन टावर निर्माण को लेकर छिड़ा आंदोलन आखिरकार प्रशासन को झुकाने में कामयाब रहा। दो दिन तक चले जबरदस्त किसान प्रदर्शन, सैकड़ों किसानों की लामबंदी, विपक्षी दलों और भाजपा नेतृत्व के दबाव के बाद प्रशासन बातचीत की टेबल पर आया।
मान्धाता विधायक नारायण पटेल की पहल पर पीड़ित महिला किसान के पुत्र और किसान नेताओं की कलेक्टर से बैठक हुई। इसमें पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा और आंदोलन के दौरान 9 किसान नेताओं पर दर्ज FIR वापस लेने पर सहमति बन गई। हालांकि किसान संगठनों ने साफ कह दिया - "कागज पर आदेश उतरेगा तभी संघर्ष खत्म माना जाएगा।"
सामान्य प्रोजेक्ट था, बन गया जिले का सबसे बड़ा आंदोलन
प्रशासन ने शुरुआत में इसे रूटीन शासकीय काम समझकर भारी पुलिस बल के साथ टावर लगाना शुरू कर दिया। बिना सहमति और उचित मुआवजे के जमीन पर काम शुरू होने और विरोध करने वाले किसानों पर FIR दर्ज होते ही मामला भड़क गया। FIR ने आग में घी का काम किया। इसके बाद राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ, संयुक्त कृषक संगठन, भारतीय किसान संघ, करनी सेना और कांग्रेस तक एक मंच पर आ गए। सुलगांव किसान प्रतिरोध का केंद्र बन गया।
विधायक पुत्र का बयान: "पुलिस भेजने से पहले बात करनी थी"
आंदोलन का सबसे विस्फोटक मोड़ तब आया जब मान्धाता विधायक नारायण पटेल के पुत्र दीपक पटेल ने किसानों के बीच मंच से कहा - "प्रशासन को इतनी बड़ी कार्रवाई से पहले स्थानीय जनप्रतिनिधियों, सरपंच और भूमि स्वामी से चर्चा करनी चाहिए थी। जिस तरह मामला संभाला गया, उससे अनावश्यक विवाद खड़ा हुआ।"
उनका यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और इसे प्रशासनिक चूक की सीधी स्वीकारोक्ति माना जा रहा है। किसान अब पूछ रहे हैं - गलती मानी तो जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई कब होगी?
विजय चौधरी की चेतावनी- 15 दिन की दी डेडलाइन
मंच से किसान नेता विजय चौधरी ने दो टूक कहा - "आज ही FIR खत्म हो। अगले 15 दिन में कोई नया मुकदमा या दबाव बना तो सीधे विधायक कार्यालय के सामने धरना देंगे।" शुक्रवार को किसानों को खेत तक पहुंचने से पहले हिरासत में लेने और पुनासा एसडीओपी मनोहर सिंह गवली की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए।
फिलहाल आंदोलन स्थगित है, पर किसान एकता ने साबित कर दिया कि संवाद की जगह लाठी चलाओगे तो सत्ता को भी बैकफुट पर आना पड़ेगा।