बड़ा दावा- मंत्री प्रतिमा बागरी अब महज दो महीने की मंत्री शेष, जाति प्रमाण पत्र फर्जी! मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ेगा

Edited By meena, Updated: 24 Apr, 2026 05:33 PM

minister pratima bagri is now a minister for only two months

मध्यप्रदेश सरकार की नगरीय प्रशासन राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर चल रहे विवाद पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर ने कड़ा रुख अपनाया है। कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के...

भोपाल (इजहार खान) : मध्यप्रदेश सरकार की नगरीय प्रशासन राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर चल रहे विवाद पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर ने कड़ा रुख अपनाया है। कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष एवं याचिकाकर्ता प्रदीप अहिरवार द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय की डबल बेंच ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है।  न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि पिछले लगभग 1 वर्ष से इस मामले की जांच लंबित क्यों रखी गई और इसे दबाकर क्यों रखा गया। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देशित किया है कि उच्च स्तरीय छानबीन समिति इस मामले की 60 दिनों के भीतर जांच कर निर्णय प्रस्तुत करे। 

कोर्ट के निर्देश पर याचिकाकर्ता प्रदीप अहिरवार उत्साहित

आपको बता दें किं प्रदीप अहिरवार द्वारा राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर उच्च स्तरीय जांच समिति में शिकायत दर्ज कराई गई थी। प्रदीप अहिरवार का कहना है कि प्रतिमा बागरी ने, सामान्य वर्ग के राजपूत बागरी/ बागड़ी समाज से संबंध रखने के बावजूद अनुसूचित जाति वर्ग का फर्जी प्रमाण पत्र बनवाया गया है। राजपूत होने के बाद भी प्रतिमा ने अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र बनवाया और मंत्री बन गई।

मंत्री प्रतिमा बागरी अब महज दो महीने की मंत्री शेष-प्रदीप

कोर्ट फैसले पर उत्साहित प्रदीप अहिरवार ने कहा है कि “मंत्री प्रतिमा बागरी अब महज दो महीने की मंत्री ही शेष बची हुई हैं। जांच समिति की रिपोर्ट आने के बाद हमें पूरा विश्वास है कि उनका जाति प्रमाण पत्र फर्जी पाया जाएगा और उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ेगा।”

उन्होंने आरोप लगाया कि “मुख्यमंत्री. मोहन यादव की सरकार अधिकारियों और अपने मंत्रियों को बचाने में लगी हुई है। प्रारंभिक रूप से यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि प्रतिमा बागरी का जाति प्रमाण पत्र संदिग्ध है, इसलिए छानबीन समिति लगातार दबाव में आकर जांच को धीमा रखे हुए थी।”

अहिरवार ने कहा कि यह मामला सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा हुआ है। यदि कोई व्यक्ति गलत तरीके से अनुसूचित जाति का लाभ प्राप्त करता है, तो यह वास्तविक पात्र लोगों के अधिकारों का सीधा हनन है।

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