स्वास्थ्य सेवाओं में महाघोटाला! दिग्विजय सिंह ने किया फर्जी मरीज, ऊंची दरें, करोड़ों की हेराफेरी का खुलासा

Edited By Vikas Tiwari, Updated: 25 Sep, 2025 01:06 PM

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प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में जांच सेवाएं देने वाली साइंस हाउस मेडिकल्स प्राइवेट लिमिटेड पर गंभीर आरोप लगे हैं। कंपनी पर फर्जी मरीजों के नाम पर करोड़ों रुपए का घपला करने और जांच दरें ऊंची वसूलने का आरोप है। राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने कंपनी के...

भोपाल: प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में जांच सेवाएं देने वाली साइंस हाउस मेडिकल्स प्राइवेट लिमिटेड पर गंभीर आरोप लगे हैं। कंपनी पर फर्जी मरीजों के नाम पर करोड़ों रुपए का घपला करने और जांच दरें ऊंची वसूलने का आरोप है। राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने कंपनी के भ्रष्टाचार की जांच की मांग की है।

टेंडर से शुरू हुई मिलीभगत की कहानी
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, वर्ष 2021 में एनएचएम के तहत हब एंड स्पोक मॉडल पर जांच सेवाओं के लिए टेंडर जारी किया गया था। इसमें साइंस हाउस ने सबसे ज्यादा छूट का प्रस्ताव दिया और ठेका हासिल कर लिया। लेकिन इसके तुरंत बाद प्रतिद्वंद्वी कंपनी न्यूबर्ग का विलय साइंस हाउस में हो गया और दोनों ने साझेदारी में काम शुरू कर दिया। दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया केवल टेंडर में प्रतिस्पर्धा दिखाने के लिए की गई थी।

एनएबीएल मानकों के नाम पर 25% ज्यादा शुल्क
आरोप है कि टेंडर में एनएबीएल सर्टिफिकेट वाली लैब्स के आधार पर जांच दरें तय की गईं। इस वजह से शुल्क सामान्य से 25% अधिक रखा गया। जबकि उस समय किसी सरकारी लैब के पास एनएबीएल मान्यता नहीं थी। जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत से पिछले पांच वर्षों में करीब 150 से 200 करोड़ रुपए निजी कंपनियों को भुगतान कर दिया गया, जबकि मानक कभी पूरे ही नहीं हुए।

दिग्विजय सिंह की मांग
मामले में दिग्विजय सिंह ने मांग की है कि साइंस हाउस के पिछले पांच साल के सभी भुगतान और रिपोर्ट की ऑडिट कराई जाए। अस्पतालों के रिकॉर्ड और कंपनी के डेटा का मिलान हो। भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं के ठेकों के लिए कड़े मानक और निगरानी तंत्र लागू हों।

दस्तावेजों के अनुसार, नवंबर 2021 में वर्क ऑर्डर साइंस हाउस और सोदानी हॉस्पिटल्स एंड डायग्नोस्टिक प्रालि को दिया गया। लेकिन एक महीने बाद ही साइंस हाउस और न्यूबर्ग का विलय हो गया। यह कदम टेंडर की शर्तों के खिलाफ था, जिसमें ऐसी स्थिति में दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान था। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की और सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए का नुकसान होता रहा।

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